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झारखंड की कोयला खदानों में 30 करोड़ साल पुराने जीवाश्म की खोज, नॉर्थ कर्णपुरा बना शोध का केंद्र

By Muskan Thakur

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सोशल संवाद/डेस्क : झारखंड की कोयला खदानों से एक ऐसी ऐतिहासिक खोज सामने आई है, जिसने वैज्ञानिकों और भू-वैज्ञानिकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। नॉर्थ कर्णपुरा क्षेत्र में स्थित कोयला खदानों से लगभग 28 से 30 करोड़ वर्ष पुराने जीवाश्म मिले हैं। यह खोज गोंडवाना काल के प्राचीन पर्यावरण और उस समय की वनस्पतियों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करती है।

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विशेषज्ञों के अनुसार, यह खोज न केवल झारखंड के भूगर्भीय इतिहास को समृद्ध करती है, बल्कि वर्तमान जलवायु परिवर्तन को समझने में भी मददगार साबित हो सकती है। नॉर्थ कर्णपुरा जीवाश्म की यह खोज दामोदर बेसिन क्षेत्र को वैश्विक स्तर पर चर्चा में ला सकती है।

गोंडवाना काल का ऐतिहासिक महत्व

वैज्ञानिकों का मानना है कि लगभग 30 करोड़ वर्ष पहले पृथ्वी पर गोंडवानालैंड नामक एक विशाल दक्षिणी महाद्वीप था। उस समय भारत, अंटार्कटिका, दक्षिण अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया एक ही भूभाग का हिस्सा थे। झारखंड का वर्तमान नॉर्थ कर्णपुरा क्षेत्र उस समय घने दलदली जंगलों और नदियों से घिरा हुआ था।

झारखंड कोयला खदानों से मिले जीवाश्म इस बात के प्रमाण हैं कि उस दौर में यहां समृद्ध वनस्पति मौजूद थी। विशेष रूप से ग्लोसोप्टेरिस वनस्पति के अवशेषों की बड़ी मात्रा में पहचान की गई है। यह पौधा पर्मियन काल की प्रमुख वनस्पति माना जाता है।

ग्लोसोप्टेरिस वनस्पति और वैज्ञानिक खोज

खदानों की शैल परतों में पत्तों, जड़ों, बीजों और पराग कणों के जीवाश्म सुरक्षित पाए गए हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह खोज प्राचीन वनस्पति विज्ञान के अध्ययन में महत्वपूर्ण कड़ी साबित हो सकती है। ग्लोसोप्टेरिस वनस्पति की उपस्थिति यह दर्शाती है कि उस समय का वातावरण आर्द्र और दलदली रहा होगा।

विशेषज्ञों का कहना है कि इन जीवाश्मों के अध्ययन से यह समझने में मदद मिलेगी कि पर्मियन काल में पौधों का विकास किस प्रकार हुआ और वे बदलती जलवायु परिस्थितियों के अनुसार कैसे अनुकूलित हुए।

समुद्री अतिक्रमण के संकेत

नॉर्थ कर्णपुरा क्षेत्र से मिले नमूनों की जांच में ऐसे खनिज कणों के संकेत मिले हैं, जो समुद्री अतिक्रमण की ओर इशारा करते हैं। उच्च सल्फर स्तर और विशेष संरचना वाले खनिजों की उपस्थिति यह दर्शाती है कि उस समय समुद्र का पानी दलदली क्षेत्रों तक पहुंचा था।

यह तथ्य महत्वपूर्ण है क्योंकि सामान्य कोयला जमाव में इस प्रकार के संकेत दुर्लभ होते हैं। इससे यह संभावना मजबूत होती है कि पर्मियन काल में समुद्र स्तर में वृद्धि हुई थी और इसका प्रभाव दामोदर बेसिन तक पड़ा था।

जलवायु परिवर्तन से जुड़ा संबंध

वैज्ञानिकों का मानना है कि यह शोध वर्तमान जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में भी बेहद महत्वपूर्ण है। पर्मियन काल में समुद्र स्तर में वृद्धि और पर्यावरणीय बदलाव के प्रमाण मिलते हैं। आज भी वैश्विक तापमान में वृद्धि और ध्रुवीय हिमनदों के पिघलने से समुद्र स्तर बढ़ रहा है।

झारखंड कोयला खदानों से मिले साक्ष्य बताते हैं कि पृथ्वी का इतिहास लगातार बदलती जलवायु और पर्यावरणीय परिस्थितियों का गवाह रहा है। यह अध्ययन भविष्य के लिए एक चेतावनी भी माना जा सकता है कि यदि वर्तमान में पर्यावरण संरक्षण पर ध्यान नहीं दिया गया, तो गंभीर परिणाम सामने आ सकते हैं।

दामोदर बेसिन का वैश्विक महत्व

दामोदर बेसिन लंबे समय से कोयला भंडार के लिए प्रसिद्ध रहा है, लेकिन अब यह क्षेत्र पेलियो-इकोलॉजी और भूवैज्ञानिक अध्ययन के लिए भी महत्वपूर्ण बनता जा रहा है। नॉर्थ कर्णपुरा जीवाश्म की खोज से यह स्पष्ट होता है कि यह क्षेत्र लोअर गोंडवाना अनुक्रमों का उत्कृष्ट उदाहरण है।

विशेषज्ञों के अनुसार, गोंडवाना के विघटन के बाद भारत में बड़े पैमाने पर कोयला भंडार बने। उस समय ज्वालामुखीय गतिविधियों और टेक्टोनिक परिवर्तनों के कारण वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ी, जिससे हिमनद पिघले और समुद्री स्तर में वृद्धि हुई।

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