सोशल संवाद / डेस्क: इन दिनों सोशल मीडिया पर एक डरावना ट्रेंड सामने आ रहा है, जिसने मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों और प्रशासन दोनों को चिंता में डाल दिया है। कई लोग आत्महत्या से पहले वीडियो बनाकर उसे सोशल मीडिया पर पोस्ट कर रहे हैं। हाल ही में मध्य प्रदेश के खंडवा और बेंगलुरु जैसे शहरों में ऐसे मामले सामने आए जहां लोगों ने अंतिम शब्द वीडियो में कह कर फिर आत्महत्या कर लिए।

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मनोचिकित्सकों का मानना है कि यह सिर्फ एक पोस्ट नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य संकट का ऐलान है। इन वीडियोज़ का वायरल होना “Werther Effect” को जन्म देता है, जिससे और लोग—खासतौर पर युवा—ऐसी घटनाओं की नकल कर सकते हैं।
सोशल मीडिया की भूमिका
फेसबुक (अब मेटा), यूट्यूब और इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म्स ने भले ही AI आधारित मॉडरेशन और रिपोर्टिंग सिस्टम लागू किए हैं, लेकिन वे अब तक नाकाफी साबित हो रहे हैं। 2018 से मेटा ने संदिग्ध पोस्ट पर अलर्ट भेजने का काम शुरू किया था, जबकि यूट्यूब आत्महत्या से जुड़े कंटेंट पर सख्त नीति अपनाता है। इसके बावजूद वीडियो बनाने और पोस्ट करने की घटनाएं थम नहीं रही हैं।
विशेषज्ञों की राय
मनोचिकित्सक डॉ. सत्यकांत त्रिवेदी के मुताबिक, “सोशल मीडिया का वायरल कल्चर और मानसिक दबाव लोगों को यह कदम उठाने के लिए प्रेरित करता है। ये वीडियो दूसरों के लिए ट्रिगर बन सकते हैं।” वहीं, साइकोलॉजिस्ट डॉ. विधि एम. पिलानिया का कहना है कि “ये वीडियो कई बार मदद की पुकार भी हो सकते हैं, लेकिन जब उन्हें नजरअंदाज किया जाता है, तब मामला गंभीर हो जाता है।”
आगे क्या किया जाना चाहिए?
AI टूल्स को और सख्त बनाया जाए ताकि शुरुआती संकेत पहचान में आ सकें।
सस्पिशस पोस्ट पर तुरंत हेल्पलाइन अलर्ट (जैसे 1800-233-3330) दिखना चाहिए।
लाइव कंटेंट पर मानव मॉडरेटर बढ़ें, ताकि तुरंत प्रतिक्रिया मिल सके।
मेंटल हेल्थ अवेयरनेस अभियान चलाए जाएं, खासकर युवाओं के लिए।
समस्या का समाधान केवल सोशल मीडिया को दोष देने में नहीं, बल्कि उसे जागरूक और संवेदनशील बनाने में है। अब वक्त है कि ये प्लेटफॉर्म सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि मानसिक सुरक्षा का साधन भी बनें।










