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जमशेदपुर: पेसा नियमावली पर राजनीति नहीं, संविधान की भावना से हो समाधान : सरयू राय

By Riya Kumari

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जमशेदपुर
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सोशल संवाद / जमशेदपुर :  जमशेदपुर पश्चिम के विधायक सरयू राय ने कहा है कि पेसा नियमावली मामले का अनावश्यक रूप से राजनीतिकरण किया जा रहा है।  यहां जारी बयान में सरयू राय ने कहा कि सरकार और विपक्ष की ओर से इस बारे में आ रही प्रतिक्रियाएं राजनीति से प्रेरित प्रतीत हो रही है।

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उन्होंने कहा कि  पेसा अधिनियम पारित होने के कई वर्षों तक पेसा नियमावली नहीं बन पाने के कारण जो असमंजस की स्थिति बनी थी, वह स्थिति वर्तमान सरकार द्वारा पेसा नियमावली बना देने सेे समाप्त हो गयी है। अब प्रावधान सिर्फ इतना ही करना है कि राज्य सरकार ने जो पेसा नियमावली बनाया है वह संविधान और नियमों की भावना के अनुरूप है या नहीं।

राय ने कहा कि उनका मानना है कि राज्य सरकार ने जैसा उचित समझा, वैसा पेसा नियमावली बनाया है। यदि इसमें कोई कमी है और यह संविधान और कानून की प्रावधानों के अनुरूप नहीं है तो सरकार इसमें संसोधन कर सकती है।

राय ने कहा कि सरकार यदि उचित समझे तो इसमें संशोधन कर सकती है। वह बातें सरकार के ध्यान में लायी जानी चाहिए, जो पेसा नियमावली की कमियों को दर्शाती है और जिनके अनुरूप पेसा कानून में संशोधन किया जा सकता है।

सरयू राय ने कहा कि पेसा नियमावली वस्तुतः राज्य के अधिसिूचत क्षेत्रों में पंचायती राज के प्रावधानों को अधिसूचित क्षेत्र की विशेषताओं के अनुरूप लागू कराने के बारे में है। इसका प्रावधान भारत के संविधान में है जिसके अनुसार भारत सरकार और राज्य सरकार ने पेसा अधिनियम पारित किया है।

उन्होंने कहा कि अधिसूचित क्षेत्रों में पंचायती राज के प्रावधान प्रचलित प्रशासन के अनुरूप होना चाहिए। यही पेसा कानून की नियमावली का उद्देश्य है। राज्य सरकार पेसा नियमावली को सार्वजनिक कर दे और जिन्हें इसमें कमी दिखाई पड़ रही है वे इन कमियों को चिन्हित कर दे। ऐसा होगा तभी पेसा नियमावली को संविधान और कानून की भावना के अनुसार बनाया जा सकता है।

राय के अनुसार, वैसे किसी भी नियमावली में हमेशा ही संशोधन की गुंजाइश रहती है। सरकार के भीतर, न्यायपालिका के समक्ष और विधानसभा की प्रासंगिक समिति के सामने पेसा नियमावली का विश्लेषण किया जा सकता है। ये सभी वैधानिक मार्ग हैं। इन वैधानिक मार्गों के अनुरूप, नियमावली बनाने वाली सरकार और नियमावली की अलोचना करने वाले समूह अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करें तो असमंजस की स्थिति समाप्त होगी।

इसके अतिरिक्त राजनीतिक उद्देश्य से नियमावली का समर्थन करना और विरोध करना संविधान की भावना के अनुरूप नहीं होगा। यह एक गंभीर संवैधानिक मामला है। पंचायती राज के प्रावधानों को स्वशासन और सुशासन के अनुरूप प्रतिस्थापित करना इसका उद्देश्य है। इस मामले को राजनीतिक दृष्टि से देखना उचित नहीं होगा।

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