सोशल संवाद / डेस्क : गम्हरिया स्थित सरना उमूल (जाहेरस्थान) में कालिकापुर के मांझी बाबा, नायके बाबा एवं आदिवासी समाज के लोगों के साथ समाज से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर चर्चा हुई। इस दौरान हम लोगों ने वहां पौधारोपण भी किया।

यह भी पढे : ठंड का येलो अलर्ट, स्कूल भी बंद, शीतलहर से ठिठुर रहे झारखंड को कब मिलेगी राहत
राज्य सरकार द्वारा पेसा के नाम पर जिस प्रकार आदिवासियों को छलने एवं उनके अधिकार छीनने का काम किया जा रहा है, उसे लेकर समाज में भारी आक्रोश है।
कभी डैम, कभी फैक्ट्री, तो कभी विकास योजनाओं के नाम पर आदिवासियों/ मूलवासियों को विस्थापित करने वाले लोग, ना सिर्फ भूमिपुत्रों को वहां से उजाड़ रहे हैं, बल्कि उनकी सामाजिक व्यवस्था तथा उनके अस्तित्व को ही खत्म कर रहे हैं। उदाहरण के तौर पर, चांडिल डैम बनाने वक्त 116 गांव डूब गए, लेकिन उन हजारों ग्रामीणों को क्या मिला? कहां गए वे लोग? आज वे किस हाल में हैं?
हम आदिवासी विकास विरोधी नहीं हैं, लेकिन हमें ऐसी व्यवस्था चाहिये, जिसमें हम मात्र चंद रूपयों के लिए पुस्तैनी जमीन नहीं देंगे, बल्कि सभी प्रभावित परिवारों को उनके जमीन पर खुलने वाली फैक्ट्रियों के लाभ में साझीदार बनाया जाये, ताकि उनकी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित हो सके। इसकी शुरुआत टाटा लीज नवीकरण को रोक कर की जानी चाहिए।
जिस दिन कैबिनेट की बैठक में सरकार ने पेसा अधिनियम को पास किया, उसी कैबिनेट में हिंडाल्को को नोवामुंडी (पश्चिम सिंहभूम) में साढ़े आठ सौ एकड़ जमीन, बिना ग्राम सभा की सहमति के दी गई। उस जमीन पर आदिवासी समाज के लोग हजारों सालों से खेती करते हैं, मवेशी चराते हैं, उस भूमि पर देशाउली व जाहेरस्थान भी है। वहां के ग्रामीण इसका विरोध कर रहे हैं। इसी से पता चलता है कि सरकार पेसा एवं ग्राम सभाओं के अधिकारों को कितनी अहमियत देती है। इन मुद्दों पर समाज को जागरूक करने के लिए, हम लोग पूरे झारखंड में अभियान चलायेंगे।










