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भारत में ट्रांसजेंडर और समलैंगिकों के रक्तदान पर रोक बरकरार, सुप्रीम कोर्ट में केंद्र का पक्ष

By Muskan Thakur

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सोशल संवाद/डेस्क : रक्तदान को अक्सर महादान कहा जाता है, क्योंकि इससे किसी जरूरतमंद व्यक्ति की जान बचाई जा सकती है। दुर्घटना, सर्जरी या गंभीर बीमारियों के दौरान कई मरीजों को तत्काल रक्त की आवश्यकता होती है। ऐसे समय में स्वैच्छिक रक्तदान बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसके बावजूद भारत में आज भी रक्त की भारी कमी बनी हुई है। अनुमान के अनुसार देश में हर दिन हजारों मरीजों को समय पर रक्त नहीं मिल पाता, जिससे कई लोगों की जान जोखिम में पड़ जाती है।

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इसी बीच रक्तदान से जुड़े नियमों को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है। हाल ही में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में स्पष्ट किया कि ट्रांसजेंडर व्यक्तियों, समलैंगिक पुरुषों और यौनकर्मियों के रक्तदान पर लगा प्रतिबंध फिलहाल जारी रहेगा। सरकार का कहना है कि यह फैसला किसी समुदाय के खिलाफ भेदभाव नहीं बल्कि मरीजों की सुरक्षा को ध्यान में रखकर लिया गया है।

कौन कर सकता है रक्तदान?

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार भारत में 18 से 65 वर्ष की आयु का कोई भी स्वस्थ व्यक्ति रक्तदान कर सकता है। इसके लिए कुछ जरूरी शर्तें भी निर्धारित हैं। रक्तदाता का वजन कम से कम 50 किलोग्राम होना चाहिए और हीमोग्लोबिन का स्तर लगभग 12.5 से 13 ग्राम के बीच होना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति इन मानकों पर खरा उतरता है और पूरी तरह स्वस्थ है, तो वह स्वेच्छा से रक्तदान कर सकता है।

किन लोगों पर है रोक?

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि वर्तमान दिशानिर्देशों के अनुसार ट्रांसजेंडर व्यक्तियों, समलैंगिक पुरुषों और महिला यौनकर्मियों को रक्तदान करने की अनुमति नहीं है। यह नियम नेशनल ब्लड ट्रांसफ्यूजन काउंसिल और राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन द्वारा जारी रक्तदाता चयन संबंधी दिशानिर्देशों का हिस्सा है। इन दिशानिर्देशों में इन समूहों को एचआईवी संक्रमण के उच्च जोखिम वाले वर्ग में रखा गया है। इसी संभावित खतरे को देखते हुए इनके रक्तदान पर प्रतिबंध लगाया गया है।

कोर्ट में क्या हुई बहस?

इस मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कोर्ट को बताया कि विशेषज्ञों की राय के आधार पर यह प्रतिबंध जारी रखा गया है। उनका कहना था कि यदि इस प्रतिबंध में ढील दी जाती है, तो रक्त प्राप्त करने वाले मरीजों के लिए संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है।

दूसरी ओर याचिकाकर्ताओं की तरफ से यह तर्क दिया गया कि यह फैसला लोगों को उनकी लैंगिक पहचान और यौनिकता के आधार पर अलग करता है। हालांकि अदालत ने फिलहाल केंद्र सरकार के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि रक्त प्राप्त करने वाले मरीजों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है। अदालत ने यह भी कहा कि यदि संक्रमण का थोड़ा सा भी खतरा हो, तो उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

देश में रक्तदान की जरूरत

इन कानूनी बहसों के बीच एक सच्चाई यह भी है कि भारत में रक्तदान की दर अभी भी जरूरत से कम है। आंकड़ों के मुताबिक देश में हर साल करीब 1.4 करोड़ यूनिट रक्त की आवश्यकता होती है, जबकि लगभग 30 से 40 लाख यूनिट रक्त की कमी रह जाती है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि लोगों को रक्तदान के प्रति अधिक जागरूक होने की जरूरत है। नियमित रक्तदान न केवल समाज के लिए लाभकारी है बल्कि इससे रक्तदाता को भी कई स्वास्थ्य लाभ मिल सकते हैं। इसलिए विशेषज्ञ लोगों से अपील करते हैं कि यदि वे पूरी तरह स्वस्थ हैं और तय मानकों को पूरा करते हैं, तो आगे आकर स्वेच्छा से रक्तदान जरूर करें।

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