सोशल संवाद/डेस्क: विक्रम नाथ ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते इस्तेमाल पर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि यह तकनीक वकीलों के अनुभव और जजों की नैतिक जिम्मेदारी का विकल्प नहीं बन सकती। उन्होंने स्पष्ट किया कि AI एक सहायक टूल जरूर है, लेकिन इसे कानून बनाने या न्यायिक निर्णय लेने की भूमिका नहीं दी जा सकती।

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तेलंगाना में आयोजित एक कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि AI का सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए तो यह समय बचाने और कानूनी प्रक्रिया के कुछ हिस्सों को आसान बनाने में मदद कर सकता है। हालांकि, उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि तकनीक का अंधाधुंध उपयोग न्यायिक व्यवस्था के लिए खतरा बन सकता है।
जस्टिस नाथ ने कहा कि हाल के समय में सुप्रीम कोर्ट में AI से तैयार गलत सामग्री और फर्जी कानूनी संदर्भ (साइटेशन) के मामले सामने आए हैं, जो न्याय प्रक्रिया की विश्वसनीयता को प्रभावित करते हैं। उन्होंने कहा कि यह केवल तकनीकी गलती नहीं, बल्कि न्याय की गुणवत्ता पर सीधा असर डालने वाला मुद्दा है।
उन्होंने जोर देकर कहा कि AI के गलत इस्तेमाल के कारण इसे पूरी तरह से खारिज करना भी सही नहीं है। इसका समाधान है सही जानकारी, नैतिक अनुशासन और पेशेवर मानकों के साथ इसका उपयोग। उन्होंने लोगों को सलाह दी कि AI का इस्तेमाल करते समय उसकी सीमाओं को समझना बेहद जरूरी है।
जस्टिस नाथ ने यह भी कहा कि नई तकनीक जहां एक ओर कानूनी काम को आसान बना सकती है, वहीं दूसरी ओर लापरवाही और नए तरह के अपराधों को भी जन्म दे सकती है। इसलिए टेक्नोलॉजी को न तो केवल नया होने के कारण ठुकराना चाहिए और न ही सिर्फ तेज होने के कारण आंख मूंदकर अपनाना चाहिए।
इस कार्यक्रम में सतीश चंद्र शर्मा और अपारेष कुमार सिंह ने भी अपने विचार साझा किए। अंत में उन्होंने कहा कि न्याय व्यवस्था का भविष्य केवल डिजिटल प्रक्रियाओं पर निर्भर नहीं है, बल्कि यह मजबूत संस्थाओं और ईमानदार व्यक्तियों पर टिका हुआ है।









