सोशल संवाद / रांची: संगीत नाटक अकादमी, नई दिल्ली के प्रतिष्ठित कार्यक्रम “प्रातः स्मरण” के तहत रविवार को रांची के ऑडिटोरियम सभागार में छऊ नृत्य एवं भारतीय लोकनाट्य परंपरा पर विशेष व्याख्यान-प्रदर्शन का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम झारखंड सरकार के पर्यटन, कला-संस्कृति, खेलकूद एवं युवा कार्य विभाग के सहयोग से संपन्न हुआ।

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कार्यक्रम के मुख्य वक्ता एवं प्रस्तोता अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त छऊ गुरु तपन कुमार पटनायक रहे। उन्होंने छऊ नृत्य की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, इसकी विशिष्ट शैली, तकनीक और सांस्कृतिक महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। साथ ही व्यावहारिक प्रदर्शन के माध्यम से छऊ नृत्य की आकर्षक मुद्राओं, मुखौटों की भूमिका और इसकी कलात्मक विशेषताओं को दर्शकों के समक्ष जीवंत रूप में प्रस्तुत किया।
अपने संबोधन में गुरु पटनायक ने कहा कि छऊ केवल एक लोकनृत्य नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, लोक जीवन, प्रकृति और आध्यात्मिक परंपराओं का सशक्त प्रतिबिंब है। उन्होंने बताया कि छऊ नृत्य के माध्यम से सामाजिक जागरूकता, पर्यावरण संरक्षण, महिला सशक्तिकरण और भारतीय महाकाव्यों की कथाओं को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया जाता रहा है।
उन्होंने महिषासुर वध, रामायण और महाभारत पर आधारित छऊ प्रस्तुतियों का उल्लेख करते हुए कहा कि यह कला समाज को अपनी जड़ों से जोड़ने का कार्य करती है। साथ ही नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
कार्यक्रम में नाटक, लोककला एवं सांस्कृतिक क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों ने भी अपने विचार रखे। वक्ताओं ने झारखंड की समृद्ध लोककलाओं के संरक्षण और संवर्धन की आवश्यकता पर बल देते हुए युवाओं को पारंपरिक कलाओं से जोड़ने की अपील की।
गौरतलब है कि गुरु तपन कुमार पटनायक सरायकेला छऊ शैली के प्रमुख हस्ताक्षरों में शामिल हैं। छऊ कला के संरक्षण, प्रचार-प्रसार और वैश्विक पहचान दिलाने में उनके योगदान को देखते हुए उन्हें कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। वे वर्षों से विभिन्न सांस्कृतिक संस्थाओं और प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से लोक कलाओं के संवर्धन में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।
कार्यक्रम में कलाकारों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों, सांस्कृतिक कर्मियों और कला प्रेमियों की बड़ी संख्या उपस्थित रही। आयोजन का उद्देश्य भारतीय लोक एवं पारंपरिक कलाओं के प्रति जागरूकता बढ़ाना तथा उनके संरक्षण और विकास को प्रोत्साहित करना था।









