सोशल संवाद / डेस्क : भारत के सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा है कि सुरक्षित फुटपाथ पर चलना और सुरक्षित तरीके से सड़क पार करना हर नागरिक का मौलिक अधिकार है। अदालत ने इसे संविधान के अनुच्छेद 19(1)(d) (देश में स्वतंत्र रूप से घूमने का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) से जोड़ते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की है।

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क्या है पूरा मामला?
यह फैसला एक दर्दनाक सड़क हादसे से जुड़े मुआवजा मामले की सुनवाई के दौरान आया। मामले में एक पांच वर्षीय बच्चा अपने पिता के साथ स्कूल जा रहा था, तभी एक टैंकर ने उसे कुचल दिया। जिस स्थान पर हादसा हुआ वहां न तो फुटपाथ था और न ही पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित क्रॉसिंग।
इस मामले ‘मनियार इलियाज शेख रियाज बनाम पी. अय्यप्पन’ की सुनवाई करते हुए जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस ए.एस. चंदुरकर की पीठ ने 19 जून को यह अहम फैसला सुनाया।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब तक देश में सड़कों और फुटपाथों की व्यवस्था में सुधार नहीं होगा, तब तक ऐसे हादसे होते रहेंगे। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि मोटर वाहन अधिनियम, 1988 में पैदल यात्रियों के अधिकारों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया है।
कोर्ट ने कहा कि वर्षों तक सड़क निर्माण में मोटर वाहनों को प्राथमिकता दी गई, जबकि पैदल चलने वालों की सुरक्षा को नजरअंदाज कर दिया गया। आज हालात ऐसे हैं कि कई जगह पैदल यात्रियों को सड़क पर चलने के लिए मजबूर होना पड़ता है।
भारत में पैदल यात्रियों की स्थिति चिंताजनक
सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 2019 से 2024 के बीच देश में सड़क हादसों में 1.8 लाख से अधिक पैदल यात्रियों की मौत हुई। यानी हर साल औसतन 30,500 लोग सड़क दुर्घटनाओं में जान गंवा रहे हैं। इनमें लगभग 31 प्रतिशत मौतें राष्ट्रीय राजमार्गों पर हुईं।
विशेषज्ञों का मानना है कि सुरक्षित फुटपाथ, पैदल पार पथ (Pedestrian Crossing) और बेहतर शहरी योजना से इन दुर्घटनाओं में बड़ी कमी लाई जा सकती है।
फुटपाथों की हालत बनी बड़ी चुनौती
देश के कई शहरों में फुटपाथ या तो टूटे हुए हैं, अतिक्रमण का शिकार हैं या फिर बीच में ही समाप्त हो जाते हैं। कई जगह रेहड़ी-पटरी, अवैध पार्किंग और निर्माण कार्य के कारण पैदल यात्रियों को सड़क पर उतरना पड़ता है, जिससे दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ जाता है। विकलांग व्यक्तियों, बुजुर्गों और बच्चों के लिए यह समस्या और भी गंभीर हो जाती है।
फैसले का क्या होगा असर?
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद राज्य सरकारों और नगर निकायों से उम्मीद की जा रही है कि वे सुरक्षित, बाधारहित और निरंतर फुटपाथ विकसित करने की दिशा में ठोस कदम उठाएंगे। अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया कि सड़कें केवल वाहनों के लिए नहीं हैं। यदि सड़क बनेगी, तो उसके साथ सुरक्षित फुटपाथ भी होना चाहिए।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला केवल एक कानूनी आदेश नहीं, बल्कि देश के करोड़ों पैदल यात्रियों की सुरक्षा और गरिमा से जुड़ा महत्वपूर्ण संदेश है। अब यह जिम्मेदारी सरकारों और स्थानीय निकायों की है कि वे इस संवैधानिक अधिकार को जमीन पर भी प्रभावी ढंग से लागू करें।










