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गरमा मूंग की खेती से बदली किसान की तकदीर, कृषि विभाग के सहयोग से बढ़ी आय, अन्य किसानों के लिए बने प्रेरणा स्रोत

By Riya Kumari

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गरमा मूंग की खेती से बदली किसान की तकदीर, कृषि विभाग के सहयोग से बढ़ी आय, अन्य किसानों के लिए बने प्रेरणा स्रोत

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सोशल संवाद /डेस्क : कृषि आधारित अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने तथा किसानों की आय में वृद्धि के उद्देश्य से पश्चिमी सिंहभूम जिला प्रशासन एवं कृषि विभाग द्वारा संचालित विभिन्न योजनाओं का सकारात्मक प्रभाव अब गांव-गांव में दिखाई देने लगा है। जिले में किसानों को परंपरागत खेती के साथ-साथ फसल विविधीकरण, आधुनिक कृषि तकनीक एवं वैज्ञानिक खेती के लिए लगातार प्रेरित किया जा रहा है। इसी प्रयास का एक उत्कृष्ट उदाहरण सदर चाईबासा प्रखंड अंतर्गत टेकराहातु पंचायत के कुन्दुबेड़ा गांव निवासी किसान लक्ष्मी नारायण पुरती हैं, जिन्होंने कृषि विभाग के मार्गदर्शन में गरमा मूंग की खेती अपनाकर अपनी आर्थिक स्थिति को सशक्त बनाया है। आज वे अपने क्षेत्र के किसानों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन चुके हैं।

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लक्ष्मी नारायण पुरती लगभग 3 एकड़ कृषि भूमि के स्वामी हैं। पहले वे अपनी अधिकांश भूमि पर केवल धान की खेती करते थे। धान की खेती से उन्हें लगभग 35 क्विंटल उत्पादन प्राप्त होता था, लेकिन खेती की बढ़ती लागत, मौसम की अनिश्चितता तथा बाजार मूल्य में उतार-चढ़ाव के कारण अपेक्षित आर्थिक लाभ नहीं मिल पाता था। वर्ष 2022 में अत्यधिक वर्षा के कारण उनकी धान की फसल बुरी तरह प्रभावित हुई, जिससे उन्हें आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा। उस समय परिवार के भरण-पोषण एवं कृषि कार्य को आगे बढ़ाने में भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।

इसी दौरान कृषि विभाग एवं आत्मा द्वारा किसानों के लिए आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रमों, कृषक गोष्ठियों तथा जागरूकता शिविरों में भाग लेने का अवसर मिला। प्रखंड तकनीकी प्रबंधक एवं कृषि वैज्ञानिकों ने उन्हें कम अवधि, कम सिंचाई और कम लागत में अधिक लाभ देने वाली दलहनी फसलों के बारे में जानकारी दी। किसानों को बताया गया कि गरमा मूंग की खेती से न केवल अतिरिक्त आय प्राप्त की जा सकती है, बल्कि इससे भूमि की उर्वरता भी बढ़ती है तथा अगली फसल के लिए मिट्टी में प्राकृतिक नाइट्रोजन की उपलब्धता बेहतर होती है।

प्रशिक्षण के दौरान उन्हें खेत की तैयारी, उन्नत किस्म के बीज का चयन, समय पर बुवाई, संतुलित उर्वरक प्रबंधन, खरपतवार नियंत्रण, कीट एवं रोग प्रबंधन, जैविक उपायों का उपयोग, सिंचाई प्रबंधन तथा कटाई एवं भंडारण की वैज्ञानिक तकनीकों की विस्तृत जानकारी दी गई। साथ ही राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन के अंतर्गत उन्हें गरमा मूंग का उन्नत बीज उपलब्ध कराया गया। कृषि विभाग के पदाधिकारियों द्वारा समय-समय पर खेत का निरीक्षण कर आवश्यक तकनीकी परामर्श भी दिया गया, जिससे फसल का बेहतर प्रबंधन संभव हो सका।

कृषक लक्ष्मी नारायण पुरती ने लगभग 0.4 हेक्टेयर भूमि में गरमा मूंग की खेती की। वैज्ञानिक विधि अपनाने के कारण उन्हें 4.96 क्विंटल उत्पादन प्राप्त हुआ। इस खेती में उनकी कुल लागत लगभग ₹8,000 आई, जबकि बाजार मूल्य के अनुसार उन्हें लगभग ₹39,680 का सकल प्रतिफल प्राप्त हुआ। इस प्रकार उन्हें लागत निकालने के बाद भी अच्छा शुद्ध लाभ प्राप्त हुआ। यदि इसी भूमि पर धान की खेती की जाती, तो उन्हें लगभग 7.5 क्विंटल उत्पादन प्राप्त होता, जिससे प्रति एकड़ लगभग ₹13,000 से ₹15,000 तक की आय होती। इसके विपरीत गरमा मूंग की खेती से उन्हें धान की तुलना में लगभग ₹24,680 अधिक आय प्राप्त हुई। इससे स्पष्ट हुआ कि फसल विविधीकरण एवं वैज्ञानिक खेती किसानों की आय बढ़ाने का प्रभावी माध्यम है।

गरमा मूंग की खेती का एक अन्य महत्वपूर्ण लाभ यह भी है कि यह कम अवधि में तैयार होने वाली फसल है। इससे किसान धान की कटाई के बाद खाली रहने वाली भूमि का बेहतर उपयोग कर अतिरिक्त आय अर्जित कर सकते हैं। साथ ही दलहनी फसल होने के कारण यह मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, जिससे आगामी फसलों की उत्पादकता पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

आज लक्ष्मी नारायण पुरती अपने गांव एवं आसपास के किसानों के साथ अपने अनुभव साझा कर रहे हैं। उनके खेत को देखकर कई किसानों ने भी गरमा मूंग सहित अन्य दलहनी फसलों की खेती शुरू करने में रुचि दिखाई है। कृषि विभाग भी ऐसे प्रगतिशील किसानों को मॉडल किसान के रूप में विकसित कर अन्य किसानों को प्रेरित करने का कार्य कर रहा है।

लाभुक लक्ष्मी नारायण पुरती ने बताया कि “मैं पहले केवल धान की खेती करता था, लेकिन मौसम की अनिश्चितता के कारण कई बार नुकसान उठाना पड़ा। कृषि विभाग के पदाधिकारियों ने मुझे गरमा मूंग की खेती के बारे में जानकारी दी और प्रशिक्षण के साथ उन्नत बीज भी उपलब्ध कराया। वैज्ञानिक तरीके से खेती करने पर कम लागत में अच्छा उत्पादन और बेहतर आय प्राप्त हुई। अब मुझे विश्वास है कि फसल विविधीकरण ही किसानों की आय बढ़ाने का सबसे अच्छा माध्यम है। मैं आगे भी गरमा मूंग की खेती का रकबा बढ़ाऊंगा तथा अपने गांव के अन्य किसानों को भी इस खेती के लिए प्रेरित करूंगा।”

उपायुक्त मनीष कुमार ने कहा, *”पश्चिमी सिंहभूम जिला प्रशासन किसानों की आय दोगुनी करने की दिशा में केवल योजनाओं का क्रियान्वयन ही नहीं, बल्कि उन्हें व्यवहारिक रूप से सफल बनाने का कार्य कर रहा है। फसल विविधीकरण, आधुनिक कृषि तकनीकों का उपयोग और वैज्ञानिक खेती ही भविष्य की आवश्यकता है। गरमा मूंग जैसी दलहनी फसलें कम पानी, कम लागत और कम समय में बेहतर आय प्रदान करती हैं। ऐसे सफल किसान पूरे जिले के लिए प्रेरणा हैं। जिला प्रशासन का प्रयास है कि प्रत्येक किसान सरकारी योजनाओं, प्रशिक्षण एवं तकनीकी मार्गदर्शन का लाभ लेकर अपनी आय बढ़ाए और आत्मनिर्भर बने।”

जिला कृषि पदाधिकारी अमरजीत कुजूर ने कहा, *”कृषि विभाग किसानों को आधुनिक एवं वैज्ञानिक खेती से जोड़ने के लिए निरंतर कार्य कर रहा है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन एवं अन्य योजनाओं के माध्यम से उन्नत बीज, तकनीकी प्रशिक्षण तथा खेत स्तर पर मार्गदर्शन उपलब्ध कराया जा रहा है। गरमा मूंग जैसी दलहनी फसलें किसानों की अतिरिक्त आय का महत्वपूर्ण स्रोत हैं। इसके साथ ही ये मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार कर कृषि को अधिक टिकाऊ बनाती हैं। विभाग का लक्ष्य है कि जिले के अधिक से अधिक किसान फसल विविधीकरण अपनाकर अपनी आय में वृद्धि करें तथा कृषि को लाभकारी व्यवसाय के रूप में विकसित करें ।

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