सोशल संवाद/डेस्क : वंदे मातरम गीत से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा, ‘धार्मिक कारणों से राष्ट्रगीत न गाने वाले व्यक्ति को आपराधिक कार्रवाई का सामना नहीं करना चाहिए।’ कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार से जवाब मांगा है।
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कोर्ट ने यह देखने पर सहमति दी कि वंदे मातरम न गाने को दंडनीय अपराध बनाया जा सकता है या नहीं। कोर्ट ने यह तय करने से इनकार किया कि राष्ट्रगीत केवल दो अंतरों तक सीमित रहेगा या छह अंतरों तक होगा। कानून में वंदे मातरम के गायन को रोकने या गायन में जानबूझकर बाधा डालने को दंडनीय बनाया गया है।
यह सुनवाई गायक टीएम कृष्णा की याचिका पर हुई। न्यूज एजेंसी PTI के मुताबिक, याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि अंतिम चार पैरा हिंदू देवताओं के प्रति भक्ति का आह्वान करते हैं। इन पैराग्राफ को गाना अनिवार्य बनाना देश के धर्मनिरपेक्षता का उल्लंघन है।
वंदे मातरम को कानून के दायरे में लाने वाला संशोधन बिल 29 जुलाई को राज्यसभा और 30 जुलाई को लोकसभा से पास हुआ था। इसके बाद 6 अगस्त को राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने पर यह कानून बन गया।
2026 वंदे मातरम के अपमान पर कानून बना
24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रीय गीत घोषित किया था। लंबे समय तक इसके अपमान पर कोई अलग कानून नहीं था, लेकिन 2026 के मानसून सत्र में केंद्र सरकार ने ‘राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम’ बनाया।
इस कानून के तहत ‘वंदे मातरम’ के गायन को जानबूझकर रोकने, इसमें बाधा डालने या इसका सार्वजनिक अपमान करने को दंडनीय अपराध माना गया है। ऐसा करने पर 3 साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों की सजा का प्रावधान है।
इस बार 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान पहली बार लाल किले की प्राचीर से ‘वंदे मातरम’ के पूरे 6 छंद गाए गए।











