सोशल संवाद / जमशेदपुर: भारतीय तमिल समाज में नवरात्रि के दौरान बोम्मई कोलू सजाने की अनूठी परंपरा निभाई जाती है। इस परंपरा में गुड़ियों और देवी-देवताओं की मूर्तियों को सजी हुई सीढ़ियों पर स्थापित कर एक दिव्य दरबार का स्वरूप दिया जाता है। यह परंपरा धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक मेलजोल का सुंदर संगम है।
यह भी पढ़े : मानगो में एनएच-33 के निर्माण में सुस्ती पर भड़के विधायक सरयू राय, दशहरा के बाद आंदोलन की चेतावनी
‘बोम्मई’ का अर्थ गुड़िया और ‘कोलू’ का अर्थ सजे हुए दरबार से है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जब देवी दुर्गा महिषासुर से युद्ध करने निकलीं, तब देवी-देवताओं ने अपनी शक्तियां उन्हें अर्पित कर दीं और स्वयं साक्षी बने। इसी मान्यता से जुड़ी परंपरा में नवरात्रि के दौरान कोलू का दिव्य दरबार सजाया जाता है।
विषम संख्या में सजाई जाती हैं सीढ़ियां
बोम्मई कोलू सजाने के लिए लकड़ी या स्टील की सीढ़ियों का इस्तेमाल किया जाता है, जिन्हें ‘पड़ी’ कहा जाता है। इन सीढ़ियों को आमतौर पर विषम संख्या में सजाया जाता है, जैसे 1, 3, 5, 7, 9 या 11। महालय अमावस्या के दिन मरपाची बोम्मई यानी लाल चंदन या सागौन की लकड़ी से बनी दूल्हा-दुल्हन की पारंपरिक मूर्तियों को दूध और हल्दी से स्नान कराकर सजाया जाता है। इसके बाद उन्हें घर के मंदिर में स्थापित कर कोलू की सजावट की जाती है।
दशावतार, अष्टलक्ष्मी और श्रीनिवास-पद्मावती विवाह की झलक
इस वर्ष भी एक तमिल परिवार में वर्षों से चली आ रही परंपरा के तहत कोलू पड़ी को आकर्षक ढंग से सजाया गया है। पहली सीढ़ी पर मरपाची बोम्मई के साथ भगवान गणेश और भगवान कृष्ण को गाय के साथ विराजमान दिखाया गया है।
मध्य की सीढ़ियों पर भगवान विष्णु के दशावतार, अष्टलक्ष्मी और गुरु की मूर्तियां सजाई गई हैं। वहीं, निचली सीढ़ियों पर पशु-पक्षियों और नर्तकों की मूर्तियों के जरिए प्रकृति और कला की झलक प्रस्तुत की गई है।
इस सजावट का एक खास आकर्षण भगवान श्रीनिवास और देवी पद्मावती के विवाह का दृश्य भी है। इसके अलावा, एक छोटे से बाजार का दृश्य तैयार किया गया है, जहां सेठ-सेठानी को फल, सब्जियां और बर्तन बेचते हुए दिखाया गया है। इस तरह कोलू में धार्मिक कथाओं के साथ-साथ सामाजिक जीवन और पारंपरिक व्यवसायों को भी स्थान दिया गया है।
नौ दिनों तक भजन, प्रसाद और तम्बुलम की परंपरा
नवरात्रि के नौ दिनों तक महिलाएं और बच्चे एक-दूसरे के घर जाकर बोम्मई कोलू देखते हैं। इस दौरान भक्ति गीत गाए जाते हैं और ललिता सहस्रनाम का पाठ किया जाता है। प्रत्येक दिन चने से बना अलग-अलग प्रसाद तैयार किया जाता है, जिसमें मटर, काबुली चना और अन्य प्रकार के चने शामिल होते हैं।
इस परंपरा में सुहागिन महिलाओं को ‘तम्बुलम’ भेंट करने का भी विशेष महत्व है। इसमें पान, सुपारी, हल्दी, कुमकुम, नारियल और उपहार दिए जाते हैं। यह परंपरा महिलाओं के बीच आत्मीयता, सम्मान और सामाजिक संबंधों को मजबूत करती है।
विजयादशमी पर विश्राम देते हैं बोम्मई को
नवरात्रि के नौ दिनों के बाद दसवें दिन विजयादशमी पर देवी के सम्मान में बोम्मई को प्रतीकात्मक रूप से सुला दिया जाता है। मान्यता के अनुसार, यह युद्ध के बाद देवी-देवताओं को विश्राम देने का प्रतीक है। इसके साथ ही नौ दिनों तक चलने वाले बोम्मई कोलू उत्सव का समापन होता है।
बोम्मई कोलू केवल गुड़ियों को सजाने की परंपरा नहीं है, बल्कि यह पीढ़ियों से चली आ रही धार्मिक मान्यताओं, पारिवारिक संस्कारों और सांस्कृतिक विरासत को संजोने का माध्यम भी है। आज भी तमिल परिवार पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ इस परंपरा को निभा रहे हैं।










