सोशल संवाद / रांची : Jharkhand High Court ने हत्या के एक मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे चमरा उरांव को बरी कर दिया है। अदालत ने पाया कि आरोपी से अंग्रेजी में सवाल पूछे गए थे, जबकि वह इस भाषा को समझ नहीं सकता था। निचली अदालत ने उसके बयान भी अंग्रेजी में दर्ज किए थे। हाई कोर्ट ने इसे निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार से जुड़ी गंभीर खामी माना।
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क्या है पूरा मामला?
यह मामला 26 फरवरी 2009 का है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, जमीन पर कब्जे को लेकर हुए विवाद में चमरा उरांव पर परमेश्वरी देवी की हत्या करने का आरोप लगा था। आरोप था कि महिला को कुएं में डुबोकर मार दिया गया।
रांची की निचली अदालत ने 25 अप्रैल 2018 को चमरा उरांव को हत्या का दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। साथ ही 20 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया था। इसके बाद आरोपी ने सजा को झारखंड हाई कोर्ट में चुनौती दी।
अंग्रेजी में दर्ज किया गया था आरोपी का बयान
अपील पर सुनवाई के दौरान High Court ने पाया कि आरोपी का बयान दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 313 के तहत अंग्रेजी में दर्ज किया गया था। चमरा उरांव अंग्रेजी नहीं समझता था और दस्तावेज पर उसके बाएं अंगूठे का निशान था।
अदालत ने गौर किया कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं था कि सवालों को आरोपी की समझ में आने वाली भाषा में समझाया गया था या दर्ज जवाबों को उसे पढ़कर सुनाया गया था।
हाई कोर्ट ने कहा कि आरोपी को अपने खिलाफ पेश किए गए साक्ष्यों और परिस्थितियों को समझकर उनका जवाब देने का उचित अवसर मिलना चाहिए। ऐसा नहीं होने पर उसके बचाव के अधिकार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार का मामला
High Court की खंडपीठ, जिसमें जस्टिस आनंद सेन और जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव शामिल थे, ने कहा कि निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार संविधान की महत्वपूर्ण गारंटी है।
अदालत के अनुसार, आरोपी से ऐसी भाषा में सवाल पूछना जिसे वह समझता ही नहीं, उसे अपने खिलाफ परिस्थितियों पर सफाई देने के प्रभावी अवसर से वंचित कर सकता है। जरूरत पड़ने पर आरोपी को समझ में आने वाली भाषा या दुभाषिए की सहायता उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
High Court ने रद्द की उम्रकैद की सजा
मामले की सुनवाई के बाद High Court ने दोषसिद्धि और सजा का आदेश रद्द कर दिया तथा चमरा उरांव को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। अदालत के फैसले में आरोपी के बयान दर्ज करने की प्रक्रिया में गंभीर खामी के साथ अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों का भी आकलन किया गया।
यह फैसला इस बात को रेखांकित करता है कि किसी भी आपराधिक मुकदमे में आरोपी को अपने खिलाफ लगे आरोपों और साक्ष्यों को समझने तथा अपना पक्ष रखने का वास्तविक अवसर मिलना जरूरी है।










