डिजिटल ठगी में बैंक की जिम्मेदारी तय हो : सुप्रीम कोर्ट

By Riya Kumari

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डिजिटल ठगी में बैंक की जिम्मेदारी तय हो : सुप्रीम कोर्ट

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सोशल संवाद/डेस्क : सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को स्पष्ट किया कि डिजिटल अरेस्ट और साइबर धोखाधड़ी के मामलों में यदि वित्तीय संस्थानों की लापरवाही सामने आती है तो पीड़ितों के नुकसान की भरपाई बैंकों को ही करनी होगी। ऐसे मामलों में बैंकों की जवाबदेही तय होनी चाहिए।

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अदालत ने कहा कि वह ऐसे कड़े निर्देश जारी करने पर विचार कर रही है, जिनके तहत बैंक अधिकारियों की चूक से हुई ठगी में बैंक पीड़ितों को गंवाई गई रकम के बराबर मुआवजा दें दें और उन पर मुकदमा भी चलाया जाए। अदालत ने जोर देकर कहा कि बैंकों को संभावित शिकार बन सकने वाले ग्राहकों के लिए सुरक्षा कवच जैसा काम करना चाहिए।

अदालत ने तीखे सवाल पूछे : मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने इस मामले की सुनवाई के दौरान सरकार से तीखा सवाल किया किकिसी सेवानिवृत्त व्यक्ति के खाते से असामान्य रूप से भारी रकम निकाले जाने पर समय रहते लेन-देन क्यों नहीं रोका जाता ?

रिपोर्ट तैयार करना केवल पोस्टमॉर्टम जैसा : पीठ ने कहा कि घटना के बाद रिपोर्ट तैयार करना केवल पोस्टमॉर्टम जैसा है। रोकथाम का क्या ? जैसे ही संदिग्ध लेन-देन दिखे, उसे फौरन रोका क्यों नहीं जाता? मुख्य न्यायाधीश ने यह भी रेखांकित किया कि केवाईसी के नियमों में संशोधनों की समीक्षा होगी: सुप्रीम कोर्ट की पीठ नेस्पष्ट किया कि वह भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के प्रस्तावित ‘अपने बैंककर्मियों की कथित संलिप्तता से समस्या और गंभीर हुई

ग्राहक को जानिए’ (केवाईसी) संशोधन निर्देश, 2026 की समीक्षा करेगी, जिसके 30 नवंबर तक अधिसूचित और 31 दिसंबर तक लागू होने की उम्मीद है। शीर्ष अदालत ने कहा कि इस नियामक ढांचे में डिजिटल धोखाधड़ी का शिकार हुए लोगों को हर्जाना देने का ठोस प्रावधान होना चाहिए।

सीधी देनदारी तय करने का विरोध जताया

सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने न्यायिक निर्देशों के जरिए बैंकों पर सीधी देनदारी तय करने का विरोध किया और दलील दी कि यह विषय नियामक के रूप में आरबीआई के दायरे में आता है। इस पर न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि अदालत वित्तीय संस्थानों पर कड़े नियम लागू कर सकती है और इसके लिए प्रत्येक बैंक को अलग से पक्षकार बनाने की आवश्यकता नहीं है।

मोबाइल दीवार पर दे मारिए, गिरफ्तारी खत्म हो जाएगी

नागरिकों के लगातार ठगी का शिकार होने पर हैरानी जताते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि व्यापक अभियानों, मीडिया रिपोटों और अदालती आदेशों के बाद भी पढ़े-लिखे लोग जालसाजों के झांसे में आ रहे हैं। सीजेआई ने टिप्पणी की कि एक लोकतांत्रिक देश में कोई नागरिक यह कैसे मान लेता है कि उसे मोबाइल पर गिरफ्तार किया जा रहा है? मोबाइल को दीवार पर दे मारिए, गिरफ्तारी खत्म हो जाएगी। इस मामले में न्याय मित्र वरिष्ठ अधिवक्ता एन. एस. नप्पिनाई ने उच्चतम न्यायालय की पीठ को अवगत कराया कि सरकार और बैंकों की तमाम पहलों के बावजूद ये वित्तीय अपराध बदस्तूर जारी हैं।

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