सोशल संवाद/डेस्क : झारखंड हाईकोर्ट ने एक मामले में स्पष्ट किया कि पत्नी की संतान पैदा करने की क्षमता से जुड़ी मेडिकल स्थिति को आधार बनाकर हिंदू विवाह को रद्द नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने शादी को अमान्य घोषित करने की मांग करने वाले पति की याचिका खारिज कर दी।
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मामले में पति का आरोप था कि उसकी पत्नी ने शादी से पहले अपनी मेडिकल स्थिति की जानकारी उससे छिपाई थी। हालांकि, सुनवाई के दौरान सामने आए साक्ष्यों से पता चला कि पति को वर्ष 2018 से ही पत्नी की स्थिति के बारे में जानकारी थी।
कोर्ट ने क्या कहा?
जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की पीठ ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम के तहत ‘धोखाधड़ी’ को कॉन्ट्रैक्ट एक्ट में दी गई परिभाषा के अनुसार नहीं देखा जा सकता।
कोर्ट ने यह भी कहा कि हिंदू कानून में विवाह को केवल एक अनुबंध नहीं, बल्कि एक संस्कार माना जाता है। ऐसे में उपलब्ध तथ्यों के आधार पर पति की ओर से विवाह को शून्य घोषित करने की मांग स्वीकार नहीं की जा सकती।
पति की याचिका खारिज
हाईकोर्ट ने माना कि जब पति को पत्नी की मेडिकल स्थिति की जानकारी पहले से थी, तो बाद में इसे विवाह रद्द करने का आधार नहीं बनाया जा सकता। कोर्ट ने पति की याचिका खारिज कर दी।
यह फैसला हिंदू विवाह अधिनियम के तहत विवाह की वैधता और मेडिकल स्थिति से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।









