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भोगनाडीह हूल कार्यक्रम पर रोक का आरोप, आदिवासी आयोजनों को लेकर विवाद

By Aditi Pandey

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Allegations of a ban on the Bhoganadih Hul program भोगनाडीह

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सोशल संवाद/डेस्क: भोगनाडीह, जो वीर सिदो-कान्हू, चांद-भैरव और वीरांगना फूलो-झानो के हूल विद्रोह की ऐतिहासिक धरती रही है, एक बार फिर विवादों में आ गई है। इस बार मामला आदिवासी आयोजनों पर रोक और प्रशासनिक दबाव का है। वीर सिदो-कान्हू के वंशज श्री मंडल मुर्मू और उनकी संस्था ‘वीर सिदो कान्हू हूल फाउंडेशन’ ने जिला प्रशासन पर आरोप लगाया है कि उनके शांति पूर्ण हूल दिवस और संथाल परगना स्थापना दिवस कार्यक्रम को रोकने के लिए जानबूझकर कई बाधाएं बनाई जा रही हैं।

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जून 2025 में आयोजित हूल दिवस कार्यक्रम को लेकर मंडल मुर्मू ने बताया कि जिला प्रशासन ने आवेदन लंबित रखा और अंततः अनुमति देने से इंकार कर दिया। जबकि ग्रामसभा ने पहले ही कार्यक्रम की मंजूरी दे दी थी। आरोप है कि प्रशासन ने आधी रात को पंडाल तोड़ दिया, ग्रामीणों पर लाठी चार्ज किया और कुछ लोगों को जेल भेज दिया। आयोजक बताते हैं कि आसपास राजनीतिक और गैर-राजनीतिक कार्यक्रम शांतिपूर्वक होते रहे, लेकिन इस बार केवल आदिवासी कार्यक्रम को रोकने की कोशिश की गई।

पिछले साल तक संथाल परगना स्थापना दिवस कार्यक्रम को लेकर कोई दिक्कत नहीं थी, लेकिन इस बार मुख्य अतिथि मंडल मुर्मू को बुलाने के बाद प्रशासन ने अत्यधिक सुरक्षा और कई शर्तें लगा दीं। आयोजकों को 30 वॉलंटियर की सूची आधार कार्ड सहित जमा करने, कार्यक्रम स्थल पर गेट सीमित करने जैसी जटिल शर्तें दी गईं।

चंपई सोरेन ने सवाल उठाया कि क्या साहिबगंज में आदिवासी कार्यक्रमों से सरकार डर रही है? उन्होंने कहा कि अन्य जिलों में, जैसे गोड्डा, जामताड़ा, देवघर और लोहरदगा में ऐसे सामाजिक और सांस्कृतिक आयोजन बिना किसी परेशानी के आयोजित होते हैं।

मंडल मुर्मू ने चेतावनी दी है कि आगामी 30 जून हूल दिवस पर झारखंड, बंगाल, बिहार और ओडिशा से लाखों आदिवासी भोगनाडीह पहुंचेंगे। उन्होंने साफ कहा, “अगर सरकार में ताकत है, तो हमें रोक कर दिखाए।”

आदिवासी नेताओं और स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि भोगनाडीह न केवल ऐतिहासिक स्थल है, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान का केंद्र भी है। इस विवाद ने आदिवासी समुदाय और प्रशासन के बीच सवाल खड़े कर दिए हैं कि क्या लोकतांत्रिक अधिकारों और सांस्कृतिक आयोजनों पर प्रशासनिक दमन बढ़ रहा है।

इस पूरे मामले ने राज्य और केंद्र की नीतियों पर भी बहस छेड़ दी है कि किस हद तक स्थानीय परंपराओं और आदिवासी कार्यक्रमों का सम्मान किया जा रहा है और प्रशासन किस तरह इन्हें बाधित कर रहा है।

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