सोशल संवाद/डेस्क : मिडिल ईस्ट में जारी भीषण संघर्ष के बीच अब चीन भी खुलकर सामने आ गया है। लगातार बढ़ती हिंसा और तनाव के माहौल को देखते हुए बीजिंग ने युद्धविराम की दिशा में सक्रिय भूमिका निभाने का संकेत दिया है। चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के राष्ट्रपति के विशेष दूत खालदून अल मुबारक के साथ हुई अहम बैठक में साफ कहा कि यह जंग कभी होनी ही नहीं चाहिए थी और अब इसे तुरंत खत्म किया जाना जरूरी है।

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बीजिंग में हुई इस बैठक के दौरान चीन ने न सिर्फ युद्धविराम की वकालत की, बल्कि यह भी भरोसा दिलाया कि वह इस संघर्ष को खत्म करने के लिए मध्यस्थता जारी रखेगा। वांग यी ने कहा कि मौजूदा हालात में किसी भी तरह की सैन्य कार्रवाई समस्या का समाधान नहीं है, बल्कि इससे हालात और बिगड़ सकते हैं। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि केवल संवाद और कूटनीति के जरिए ही इस संकट का हल निकाला जा सकता है।
चीन ने इस दौरान UAE की संप्रभुता और सुरक्षा का समर्थन भी किया और क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने के लिए सहयोग की बात कही। यह कदम ऐसे समय पर आया है जब मिडिल ईस्ट में हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं और कई देशों की चिंताएं बढ़ती जा रही हैं।
इससे पहले भी चीन कई बार इस जंग को रोकने की अपील कर चुका है। बीजिंग ने सभी पक्षों से तत्काल युद्धविराम लागू करने और बातचीत के जरिए समाधान निकालने की मांग की है। साथ ही, चीन ने ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हमलों की कड़ी आलोचना करते हुए इसे संप्रभुता का उल्लंघन बताया है। चीन का कहना है कि किसी भी देश की आंतरिक व्यवस्था में बाहरी हस्तक्षेप स्वीकार्य नहीं है।
हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम के बीच अमेरिका ने चीन पर गंभीर आरोप लगाए हैं। अमेरिकी रिपोर्ट्स के अनुसार, चीन पर ईरान को हथियार और तकनीकी सहायता देने का आरोप है। दावा किया गया है कि चीन ईरान को एंटी-शिप मिसाइल, ड्रोन और रॉकेट फ्यूल से जुड़ी तकनीक मुहैया करा रहा है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि हाल ही में चीन के जहाज रॉकेट फ्यूल बनाने वाले केमिकल्स लेकर ईरान की ओर रवाना हुए थे।
इन आरोपों के बीच चीन की शांति पहल और उसकी भूमिका को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस तेज हो गई है। एक ओर जहां चीन खुद को शांति का समर्थक बता रहा है, वहीं दूसरी ओर उस पर संघर्ष को बढ़ावा देने के आरोप भी लग रहे हैं।
फिलहाल, मिडिल ईस्ट में हालात बेहद नाजुक बने हुए हैं। ऐसे में चीन की मध्यस्थता कितनी कारगर साबित होगी, यह आने वाले दिनों में साफ हो पाएगा। दुनिया की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि क्या कूटनीति के जरिए इस जंग को रोका जा सकेगा या संघर्ष और लंबा खिंचेगा।









