सोशल संवाद/डेस्क : उत्तर प्रदेश के Ghaziabad के साहिबाबाद में रहने वाले हरीश राणा की कहानी ने पूरे देश को भावुक कर दिया है। करीब 13 वर्षों तक गंभीर बीमारी और असहनीय दर्द झेलने के बाद उन्हें अदालत से इच्छामृत्यु की अनुमति मिली। इसके बाद उनके घर पर बेहद भावुक माहौल में अंतिम विदाई दी गई।

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इस दौरान आध्यात्मिक संस्था Brahma Kumaris से जुड़ी लवली दीदी भी हरीश के घर पहुंचीं। उन्होंने आध्यात्मिक तरीके से उन्हें विदाई दी और उनके माथे पर चंदन का तिलक लगाया। विदाई के समय उन्होंने कहा, “सबको माफ करते हुए और सबसे माफी मांगते हुए शांति से सो जाओ।” उनके इन शब्दों को सुनकर वहां मौजूद परिवार के सदस्य और अन्य लोग भावुक हो गए।
2013 की घटना ने बदल दी जिंदगी
परिवार के अनुसार हरीश राणा का जन्म 12 सितंबर 1993 को दिल्ली में हुआ था। उन्होंने Chandigarh University में सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई शुरू की थी और पढ़ाई के अंतिम वर्ष में थे। साल 2013 में रक्षाबंधन के दिन एक हादसे ने उनकी पूरी जिंदगी बदल दी। बताया जाता है कि वह अपने पीजी की चौथी मंजिल से गिर गए थे। गंभीर हालत में उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहां उनका लंबा इलाज चला।डॉक्टरों ने बाद में बताया कि वे क्वाड्रिप्लेजिया नामक बीमारी से पीड़ित हो गए हैं। इस स्थिति में व्यक्ति के हाथ-पैर काम करना बंद कर देते हैं और वह पूरी तरह दूसरों पर निर्भर हो जाता है।
13 साल तक बिस्तर पर गुजरी जिंदगी
हादसे के बाद हरीश की जिंदगी पूरी तरह बदल गई। वे चल-फिर नहीं सकते थे और हर काम के लिए दूसरों पर निर्भर हो गए थे। परिवार के लिए यह समय बेहद कठिन था। करीब 13 साल तक उन्होंने बिस्तर पर ही जीवन बिताया। लगातार दर्द और शारीरिक तकलीफ के कारण उनका जीवन बेहद कठिन हो गया था। उनके माता-पिता और परिवार के अन्य सदस्य लगातार उनकी देखभाल करते रहे।
इच्छामृत्यु के लिए कानूनी लड़ाई
हरीश की बढ़ती पीड़ा को देखते हुए उनके परिवार ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने इच्छामृत्यु की अनुमति देने के लिए पहले Delhi High Court में याचिका दायर की, लेकिन वहां से उन्हें राहत नहीं मिली। इसके बाद परिवार ने मामला Supreme Court of India में पहुंचाया। कई महीनों तक चली सुनवाई के बाद अदालत ने 11 मार्च 2026 को उन्हें पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दे दी।
परिवार के लिए बेहद भावुक पल
अदालत के फैसले के बाद परिवार के लिए यह पल बेहद कठिन था। एक ओर उन्हें अपने बेटे के लंबे दर्द से मुक्ति मिलने का एहसास था, तो दूसरी ओर उसे हमेशा के लिए खो देने का दुख भी था। विदाई के दौरान हरीश की मां अपने बेटे को याद करते हुए कई बार भावुक हो गईं। उन्होंने बताया कि बचपन में हरीश बहुत शरारती था और घर में सभी का लाडला था। हरीश राणा की कहानी ने पूरे देश में इच्छामृत्यु जैसे संवेदनशील मुद्दे पर नई चर्चा शुरू कर दी है। यह मामला उन मरीजों की पीड़ा को सामने लाता है जो लंबे समय तक गंभीर बीमारी और असहनीय दर्द से जूझते हैं।









