सोशल संवाद / रांची : झारखंड हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक मामले में अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि तलाक के बाद भी पति पत्नी और बच्चों के भरण-पोषण की जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ सकता। अदालत ने पति को पत्नी और नाबालिग बेटे के लिए हर महीने 10-10 हजार रुपये देने का आदेश दिया है। इस तरह दोनों के भरण-पोषण के लिए कुल 20 हजार रुपये प्रतिमाह देने होंगे।
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मुख्य न्यायाधीश एमएस सोनक और न्यायमूर्ति मनोज प्रसाद की खंडपीठ ने यह आदेश दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि पत्नी को दी जाने वाली राशि में बेटे का खर्च शामिल नहीं होगा। बेटे को बालिग होने तक अलग से हर महीने 10 हजार रुपये दिए जाएंगे। हालांकि, हाईकोर्ट ने गढ़वा फैमिली कोर्ट के तलाक के फैसले को बरकरार रखा।
पत्नी को मिलता था सिर्फ 2 हजार रुपये मानदेय
सुनवाई के दौरान अदालत के सामने पत्नी की आर्थिक स्थिति का मामला आया। पत्नी राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत सहिया के रूप में काम करती है और उसे हर महीने लगभग 2 हजार रुपये मानदेय मिलता है। उसके नाम पर कोई अचल संपत्ति भी नहीं है। वहीं, नाबालिग बेटा पूरी तरह अपनी मां पर निर्भर है।
अदालत को बताया गया कि बच्चे के पालन-पोषण पर करीब 7 हजार रुपये प्रतिमाह खर्च होता है। इन परिस्थितियों और पति की आर्थिक स्थिति से जुड़े तथ्यों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने पत्नी और बेटे के लिए अलग-अलग 10-10 हजार रुपये मासिक भरण-पोषण तय किया।
2013 में हुई थी शादी, 2022 में मिला तलाक
मामले के अनुसार, पति-पत्नी की शादी 6 फरवरी 2013 को हुई थी। वैवाहिक विवाद के बाद पत्नी 18 सितंबर 2015 को अपने बेटे के साथ ससुराल छोड़कर चली गई। इसके बाद पति ने वैवाहिक संबंध बहाल करने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया।
20 फरवरी 2017 को पत्नी को पति के साथ वैवाहिक जीवन बहाल करने का आदेश दिया गया था, लेकिन दोनों साथ नहीं रहे। इसके बाद पति ने 2018 में तलाक का मुकदमा दायर किया। गढ़वा फैमिली कोर्ट ने 23 मई 2022 को तलाक की डिक्री पारित कर दी।
पत्नी ने हाईकोर्ट में दी थी चुनौती
फैमिली कोर्ट के फैसले के खिलाफ पत्नी ने हाईकोर्ट में अपील की। सुनवाई के दौरान पत्नी की ओर से बताया गया कि पति दूसरी शादी कर चुका है और उससे एक बच्चा भी है। ऐसे में दोनों के दोबारा साथ रहने की संभावना नहीं है।
हाईकोर्ट ने तलाक के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, लेकिन पत्नी और बेटे के भरण-पोषण के लिए अलग-अलग राशि तय की। अदालत का आदेश फैसले की तारीख से प्रभावी होगा।










