---Advertisement---

झारखंड नगर निकाय चुनाव 2026: भाजपा में बगावत से बढ़ी सियासी हलचल, डैमेज कंट्रोल में जुटा नेतृत्व

By Muskan Thakur

Published :

Follow

Join WhatsApp

Join Now

सोशल संवाद/डेस्क : झारखंड में नगर निकाय चुनाव 2026 को लेकर सियासी माहौल लगातार गर्माता जा रहा है। चुनाव भले ही औपचारिक रूप से दलीय आधार पर नहीं हो रहे हों, लेकिन राजनीतिक दलों की सक्रियता साफ दिखाई दे रही है। खासतौर पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के अंदर टिकट वितरण और समर्थित उम्मीदवारों के चयन को लेकर असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। कई शहरों में बागी तेवर अपनाए नेताओं ने पार्टी की चुनावी रणनीति को चुनौती दे दी है, जिससे भाजपा के सामने आंतरिक संकट खड़ा हो गया है।

ये भी पढे : Jharkhand Board Exams 2026: हजारीबाग में नकल पर सख्ती, सभी परीक्षा केंद्रों पर सीसीटीवी निगरानी शुरू

भाजपा ने मेयर और नगर परिषद अध्यक्ष पद के लिए अपने समर्थित उम्मीदवारों की घोषणा की, लेकिन इसके तुरंत बाद कई पुराने कार्यकर्ताओं और नेताओं ने असहमति जताई। पार्टी के भीतर उठी इस बगावत ने संगठन की एकजुटता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। ऐसे में चुनावी समीकरण प्रभावित होने की आशंका बढ़ गई है और विपक्षी दल इस स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं।

बढ़ते असंतोष को देखते हुए भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने डैमेज कंट्रोल की जिम्मेदारी अपने हाथ में ले ली है। वरिष्ठ नेताओं को मैदान में उतारकर बागी नेताओं से संवाद शुरू किया गया है। पार्टी की कोशिश है कि मान-मनौव्वल के जरिए नाराज नेताओं को मनाया जाए और नामांकन वापस लेने के लिए राजी किया जाए, ताकि वोटों का बिखराव कम हो और पार्टी समर्थित उम्मीदवारों को फायदा मिल सके।

धनबाद में स्थिति सबसे ज्यादा जटिल मानी जा रही है। यहां उम्मीदवार चयन के बाद कई बड़े नामों ने अलग राह पकड़ ली है। कुछ नेताओं ने दूसरी राजनीतिक पार्टियों का दामन थाम लिया, जबकि कई निर्दलीय रूप से चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी कर रहे हैं। इससे मुकाबला बहुकोणीय होने की संभावना बढ़ गई है और भाजपा के लिए चुनावी समीकरण मुश्किल हो सकते हैं।

मेदिनीनगर में भी टिकट वितरण को लेकर नाराजगी सामने आई है। यहां कई स्थानीय नेता और उनके समर्थक अलग-अलग उम्मीदवारों के समर्थन में सक्रिय हो गए हैं, जिससे पार्टी के भीतर गुटबाजी की स्थिति बन गई है। इसी तरह गढ़वा में भी पुराने नेताओं की दावेदारी ने संगठन को असहज कर दिया है। पार्टी के लिए यह स्थिति इसलिए चुनौतीपूर्ण है क्योंकि स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ताओं की नाराजगी सीधे चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकती है।

वहीं, कुछ क्षेत्रों में पार्टी ने तटस्थ रहने का फैसला भी लिया है, जहां उम्मीदवार चयन पर सहमति नहीं बन सकी। इस निर्णय से साफ संकेत मिलता है कि संगठन के भीतर मतभेद गहरे हैं और नेतृत्व संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है। चुनावी रणनीति तय करते समय जिला और मंडल स्तर के नेताओं की राय को महत्व दिया गया, लेकिन जमीनी हकीकत और संगठन की अपेक्षाओं के बीच तालमेल बैठाना आसान नहीं रहा।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि भाजपा समय रहते आंतरिक विवादों को सुलझाने में सफल नहीं हुई, तो विपक्षी दलों को इसका सीधा लाभ मिल सकता है। नगर निकाय चुनाव भले ही स्थानीय मुद्दों पर केंद्रित हों, लेकिन राजनीतिक संदेश और संगठन की मजबूती का असर राज्य की व्यापक राजनीति पर भी पड़ता है।

अब नजर इस बात पर है कि भाजपा का डैमेज कंट्रोल अभियान कितना सफल होता है और पार्टी अपने बागी नेताओं को किस हद तक मनाने में कामयाब रहती है। चुनावी नतीजे ही तय करेंगे कि यह अंदरूनी असंतोष पार्टी के लिए अस्थायी चुनौती साबित होता है या बड़ा राजनीतिक झटका।

YouTube Join Now
Facebook Join Now
Social Samvad MagazineJoin Now
---Advertisement---