सोशल संवाद/डेस्क: Jharkhand की राजधानी रांची को राज्य का प्रमुख शैक्षणिक केंद्र माना जाता है। लेकिन पिछले कुछ महीनों में यहां के विभिन्न उच्च शिक्षण संस्थानों से छात्रों की मौत की खबरें सामने आने के बाद विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य, शैक्षणिक दबाव और संस्थानों में काउंसलिंग की व्यवस्था को लेकर सवाल उठने लगे हैं। सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ झारखंड, रिम्स और अन्य संस्थानों से जुड़ी घटनाओं ने छात्र सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य सहायता को लेकर गंभीर चर्चा छेड़ दी है।
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रांची के शिक्षण संस्थानों में सामने आईं कई घटनाएं
मई से अक्टूबर 2026 के बीच रांची के विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों से छात्रों की मौत के कई मामले सामने आए। इनमें सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ झारखंड के छात्र, रिम्स के मेडिकल विद्यार्थी और डॉक्टरों के साथ-साथ कृषि जैव प्रौद्योगिकी संस्थान तथा IIIT से जुड़े विद्यार्थियों की घटनाएं शामिल हैं।
इन मामलों में कुछ मौतों को शुरुआती रिपोर्टों में आत्महत्या से जुड़ा बताया गया, जबकि कुछ घटनाओं की परिस्थितियां संदिग्ध बताई गईं। इसलिए प्रत्येक मामले में पुलिस जांच और आधिकारिक पुष्टि को ध्यान में रखना जरूरी है। सभी घटनाओं के पीछे एक ही कारण मानना सही नहीं होगा।
पढ़ाई और करियर का दबाव बन सकता है चुनौती
मेडिकल, इंजीनियरिंग और शोध जैसे क्षेत्रों में विद्यार्थियों को कठिन पाठ्यक्रम, परीक्षाओं, प्रतिस्पर्धा और भविष्य के करियर को लेकर दबाव का सामना करना पड़ सकता है। अच्छे अंक लाने की अपेक्षा, असफलता का डर और परिवार की उम्मीदें कुछ विद्यार्थियों के तनाव को बढ़ा सकती हैं।
हालांकि, किसी खास छात्र की मौत का कारण केवल पढ़ाई का दबाव नहीं माना जा सकता। व्यक्तिगत परिस्थितियां, पारिवारिक समस्याएं, रिश्तों में तनाव और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी परेशानियां भी अलग-अलग मामलों में भूमिका निभा सकती हैं। किसी घटना के वास्तविक कारणों का पता जांच और विश्वसनीय जानकारी से ही लगाया जा सकता है।
अकेलापन और भावनात्मक परेशानियां भी चिंता का विषय
घर से दूर हॉस्टल या किराए के कमरे में रहने वाले विद्यार्थियों के लिए नए माहौल में सामंजस्य बैठाना कई बार चुनौतीपूर्ण हो सकता है। यदि उन्हें अपनी परेशानियां साझा करने के लिए भरोसेमंद व्यक्ति या समय पर मदद नहीं मिलती, तो तनाव से निपटना और मुश्किल हो सकता है।
ऐसे में परिवार, दोस्तों, शिक्षकों और संस्थान के मेंटर्स की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। विद्यार्थियों की बात ध्यान से सुनना, उन्हें बिना किसी पूर्वाग्रह के अपनी समस्या बताने का अवसर देना और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ से संपर्क कराना मददगार हो सकता है।
उच्च शिक्षण संस्थानों में काउंसलिंग व्यवस्था मजबूत करने की जरूरत
छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य का मुद्दा केवल झारखंड तक सीमित नहीं है। जून 2026 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट की ओर से गठित राष्ट्रीय टास्क फोर्स ने उच्च शिक्षण संस्थानों में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की कमी और शिकायत निवारण तंत्र की कमजोरियों पर चिंता जताई थी।
टास्क फोर्स के सर्वे में शामिल 2,119 संस्थानों में से केवल 35 प्रतिशत ने मानसिक स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं तक पहुंच उपलब्ध होने की बात कही थी। रिपोर्ट के अनुसार, 65 प्रतिशत संस्थानों में ऐसी सेवाओं तक पहुंच उपलब्ध नहीं थी या उन्हें भविष्य में शुरू करने की योजना थी। यह सर्वे में शामिल संस्थानों का आंकड़ा है, देश के सभी संस्थानों का प्रत्यक्ष आकलन नहीं।
इस पृष्ठभूमि में शिक्षण संस्थानों में नियमित काउंसलिंग, प्रशिक्षित विशेषज्ञों की उपलब्धता, प्रभावी मेंटरशिप और शिकायतों के समाधान की व्यवस्था पर ध्यान देना जरूरी है।
केंद्र सरकार और UGC की ओर से भी जारी हैं दिशा-निर्देश
शिक्षा मंत्रालय की ओर से अगस्त 2026 में जारी जानकारी के अनुसार, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने उच्च शिक्षण संस्थानों में विद्यार्थियों के मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इनमें काउंसलिंग सेवाएं, तनाव के शुरुआती संकेतों की पहचान, आत्महत्या रोकथाम की मानक प्रक्रिया, छात्र सहायता नेटवर्क और शिकायत निवारण व्यवस्था मजबूत करने जैसे उपाय शामिल हैं।
इन दिशा-निर्देशों का प्रभावी क्रियान्वयन महत्वपूर्ण है, ताकि विद्यार्थी समय पर सहायता प्राप्त कर सकें और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी परेशानियों पर खुलकर बात कर सकें।
छात्रों की सुरक्षा के लिए संस्थानों को उठाने होंगे ठोस कदम
रांची के शिक्षण संस्थानों से सामने आई घटनाएं इस बात की जरूरत रेखांकित करती हैं कि विद्यार्थियों की सुरक्षा को केवल परिसर की भौतिक व्यवस्था तक सीमित न रखा जाए। उनके मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य को भी संस्थागत प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
संस्थानों में प्रशिक्षित काउंसलर, गोपनीय सहायता व्यवस्था, नियमित संवाद, संवेदनशील शिकायत निवारण और जरूरत पड़ने पर पेशेवर मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच सुनिश्चित करना अहम है। साथ ही, विद्यार्थियों को यह भरोसा मिलना चाहिए कि मदद मांगने पर उन्हें दोषी नहीं ठहराया जाएगा।
छात्रों की मौतों के मामलों में निष्पक्ष जांच के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य सहायता को मजबूत करना भी जरूरी है। समय पर सहयोग, संवेदनशील शैक्षणिक माहौल और प्रभावी सहायता व्यवस्था विद्यार्थियों को कठिन परिस्थितियों से निपटने में मदद कर सकती है।











