सोशल संवाद/डेस्क : सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कैंसर की जरूरी दवाओं की कई गुना अधिक कीमत वसूले जाने पर हैरानी जताई। कोर्ट ने इसे मरीजों के साथ ‘दिनदहाड़े डकैती’ करार दिया। शीर्ष अदालत ने कहा कि यह देखकर हम अचंभित हैं कि एक दवा की एमआरपी 27,000 रुपये थी, जबकि रिटेलर्स को यह 2,700 रुपये में मिल रही है।
यह भी पढे : हिम्मत है तो एमएमडीआर पर जनमत संग्रह करा ले झामुमो : निशिकांत दुबे
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने उन याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की, जिनमें दवाओं की कीमतों पर नियंत्रित करने के लिए सरकार से आदेश जारी करने की मांग की गई है।
जस्टिस नाथ ने इसे बेहद चौंकाने वाला बताते हुए कहा कि कैंसर की एक जरूरी दवा 10 गुना अधिक कीमत पर बाजार में बिक रही है। जस्टिस नाथ ने सवाल किया कि यह जबरन वसूली नहीं है, तो और क्या है? लोग इलाज के लिए अपने मकान और गहने तक बेच देते हैं।
पीठ ने कहा, यह पूरी तरह से मनमानी और बर्बादी है। यह मरीजों के साथ दिनदहाड़े डकैती के समान है। सुप्रीम कोर्ट ने सवाल किया कि मरीजों को इस तरह धोखा कैसे दिया जा सकता है। एक याचिका के सिलसिले में केंद्र की ओर से पेश एएसजी केएम नटराज ने कहा कि सरकार इस मामले को विरोधी पक्षों के बीच मुकदमेबाजी के तौर पर नहीं देख रही है। मामले की अगली सुनवाई 29 सितंबर को होगी।
जिस याचिका पर अदालत सुनवाई कर रही है उसमें मांग की गई है कि केंद्र और संबंधित अधिकारी दवा कंपनियों एवं दुकानदारों को जरूरी दवाओं के लिए बहुत ज्यादा कीमत वसूलने से रोकें। मरीजों को कम कीमत में दवाएं मिले, इसकी व्यवस्था की जाए।
जिन अफसरों पर जिम्मेदारी वे चुप
शीर्ष अदालत ने दवा की कीमतों को काबू करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान कहा, हमारे लिए यह और भी हैरान करने वाली बात है कि जिन अफसरों को इस पर कार्रवाई करनी चाहिए, वे आंख-कान बंदकर चुपचाप बैठे हैं। याचिका में कोर्ट से अधिकारियों को यह निर्देश देने का अनुरोध किया गया है कि वे दवा कंपनियों और खुदरा विक्रेताओं की ओर से जरूरी दवाओं की कथित अनुचित मूल्य वृद्धि को रोकें।
जेनेरिक दवाएं न लिखने वाले डॉक्टर पर हो कार्रवाई
दूसरी याचिका में उन डॉक्टरों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया है, जो मरीजों को जेनेरिक दवाएं नहीं लिखते हैं।
एमआरपी तय करना बहुत जरूरी है
एक याचिकाकर्ता ने पीठ को बताया कि उसकी याचिका में पंजीकृत चिकित्सा पेशेवरों के जेनेरिक दवाएं नहीं लिखे जाने का मुद्दा भी उठाया गया है। क्योंकि ऐसा नहीं होने से गरीब मरीजों को बेहद परेशानी का सामना करना पड़ता है। कोर्ट ने भी माना कि कीमत तय करना एक अहम मुद्दा है।











