सोशल संवाद / डेस्क : विगत दिनों दिल्ली के जन्तर मंतर समेत देश भर में हुए छात्रों के ऐतिहासिक आंदोलन, लाखों युवाओं के संघर्ष और लगातार उठती आवाज़ों के दबाव में आखिरकार केंद्र सरकार को झुकना पड़ा और शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान को इस्तीफा देनापड़ा। छात्रों के संघर्ष का नतीजा है कि आज सदन में पेपर लीक से जुड़े कानून में संशोधन लाने पर चर्चा हो रही है। लेकिन इसके बाद भी सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर सरकार की नीयत शुरू से ही ईमानदार थी, तो देशभर के छात्रों को सड़कों पर उतरने, लाठी खाने और अपना भविष्य दांव पर लगाने की नौबत क्यों आई? क्यों 30 बच्चों की शाहदत बाद ही फ्रेंड्स को उनकी चिंता हुई।

यह भी पढ़े : CJP Protest: पुलिस केस वापस नहीं हुए तो फिर सड़क पर उतरेगा CJP, सरकार को चेतावनी
देश के प्रधानमंत्री और गृह मंत्री जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं हैं? सेल्फी वीडियो को कानून बनाना स्वागतयोग्य है, लेकिन कानून तभी प्रभावी माना जाएगा जब दोषियों को सज़ा मिले और परीक्षा व्यवस्था में जनता का भरोसा बहाल हो. केवल नया कानून बना देने से युवाओं का विश्वास वापस नहीं आएगा।
– आज भी देश के युवाओं के मन में यह सवाल है कि जिन मामलों ने पूरे देश को झकझोर दिया, उनमें कार्रवाई का परिणाम क्या निकला? पेपर लीक के मुख्य आरोपियों में शामिल एक प्रमुख आरोपी सजीव मुखिया के खिलाफ सबूत तक पेश नहीं कर पाए और साक्ष्य के अभाव में छोड़ दिया गया. यदि जांच इतनी कमजोर होगी कि मुख्य आरोपी ही कानून के शिकंजे से बाहर निकल जाए, तो नए कानून का संदेश क्या होगा?
– सरकार को यह बताना चाहिए कि क्या केवल कानून का प्रचार करना पर्याप्त है, या फिर निष्पक्ष और वैज्ञानिक जांच के माध्यम से असली दोषियों को सज़ा दिलाना भी उसकी जिम्मेदारी है? देश का युवा कानून की घोषणा नहीं, बल्कि न्याय, पारदर्शिता और जवाबदेही चाहता है।
✓ 152 पेपर लीक: पिछले एक दशक में देश भर में कुल 152 परीक्षाओं के पेपर लीक हुए हैं, जिससे करोड़ों बच्चे प्रभावित हुए. इन घोटालों और गड़बड़ियों के कारण लगभग 7.5 करोड़ युवाओं और उनके परिवारों को मानसिक व आर्थिक संकट झेलना पड़ा।
✓ कल 27 जुलाई को नीट पेपर लीक मामले पर फास्ट ट्रैक कोर्ट में पहली सुनवाई होनी थी जिसे टाल दिया गया. सरकारी वकील के उपलब्ध ना होने की वजह से सुनवाई को अगले महीने 3 अगस्त तक के लिए टाल दिया गया।
✓ देश में छात्रों की सुरक्षा आज एक गंभीर राष्ट्रीय चिंता का विषय बन चुकी है। सुरक्षा का अर्थ केवल विद्यालय या कॉलेज परिसर तक सीमित नहीं है, बल्कि परीक्षा केंद्रों, छात्रावासों, कोचिंग संस्थानों, परिवहन, डिजिटल माध्यमों और मानसिक स्वास्थ्य तक फैला हुआ है।









