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Republic Day 2026: उत्सव के शोर में दबता भारतीय गणतंत्र

By Tamishree Mukherjee

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Republic Day 2026 Celebrations vs struggles

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सोशल संवाद / डेस्क : Republic Day 2026 नज़दीक आते ही देशभर में देशभक्ति का उन्माद दिखाई देता है।
राजपथ की भव्य परेड, सैन्य शक्ति का प्रदर्शन, ड्रोन शो, राष्ट्रपति का भाषण और प्रधानमंत्री का संदेश सब कुछ चमकदार है। स्कूलों में निबंध प्रतियोगिताएँ होती हैं, सोशल मीडिया तिरंगे से पट जाता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या भारत का गणतंत्र वास्तव में उतना ही मजबूत है, जितना वह 26 जनवरी को दिखाई देता है?

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76 साल का गणतंत्र, लेकिन सवाल आज भी ज़िंदा

भारत का संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ। डॉ. भीमराव आंबेडकर द्वारा रचित यह संविधान समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व जैसे आदर्शों पर आधारित था।

लेकिन 76 वर्षों बाद स्थिति चिंताजनक है।

  • भ्रष्टाचार
  • हिंसा और बलात्कार
  • सांप्रदायिक नफरत
  • बढ़ती असमानता
  • लोकतंत्र की आड़ में तानाशाही प्रवृत्तियाँ

ये सभी आज के भारतीय गणतंत्र के सामने खड़े कड़वे सच हैं।

आर्थिक चमक बनाम सामाजिक अंधेरा

भारत को दुनिया की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था कहा जाता है, लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और है।

  • शीर्ष 1% आबादी के पास 85% संपत्ति
  • 70 से अधिक अरबपतियों के पास राष्ट्रीय बजट से अधिक धन
  • 21% आबादी बहुआयामी गरीबी में
  • ग्रामीण भारत के 46% परिवार मूलभूत सुविधाओं से वंचित

शहरों में लग्ज़री टावर खड़े हो रहे हैं, वहीं झुग्गी-झोपड़ियाँ भी बढ़ रही हैं। यह असमानता सामाजिक विस्फोट का कारण बन रही है।

कुपोषण और महिला स्थिति: भविष्य पर संकट

  • महिला लिंगानुपात: 920 प्रति 1000
  • 35% बच्चे कुपोषित (Stunted)
  • NFHS-6 के आँकड़े साफ चेतावनी देते हैं कुपोषित पीढ़ी भारत का भविष्य नहीं गढ़ सकती

भ्रष्टाचार: गणतंत्र का कैंसर

Transparency International 2025 की रिपोर्ट में भारत 85वें स्थान पर फिसल चुका है।

  • राजनीति से नौकरशाही तक भ्रष्टाचार
  • चुनावी बॉन्ड विवाद
  • कॉर्पोरेट धन का राजनीति पर कब्ज़ा
  • सड़क से लेकर हवाई अड्डे तक कमीशन का खेल

DBT से बचत तो हुई, लेकिन

  • आधार डेटा लीक
  • पैन कार्ड धोखाधड़ी
    नई समस्याएँ बन गईं।

अपराधीकरण की गिरफ्त में राजनीति

  • 18वीं लोकसभा में 250+ सांसद आपराधिक मामलों में आरोपी
  • हत्या, अपहरण, बलात्कार के आरोपों के बावजूद चुनाव जीतना
  • चुनावी खर्च अनुमानित 1 लाख करोड़ रुपये, जिसमें 40% फंड का स्रोत अस्पष्ट
  • जातिवाद और सांप्रदायिकता ने लोकतंत्र को जकड़ लिया है।

महिला असुरक्षा: गणतंत्र पर सबसे बड़ा धब्बा

  • प्रतिदिन 86 बलात्कार मामले दर्ज
  • दलित महिलाओं पर अत्याचार दोगुना
  • निर्भया फंड के 10,000 करोड़ अब तक पूरी तरह उपयोग नहीं

फास्ट-ट्रैक कोर्ट की कमी, साइबर क्राइम सेल की निष्क्रियता और सामाजिक चुप्पी हालात और बिगाड़ रही है।

न्याय व्यवस्था और पुलिस सुधार: अधूरी क्रांति

  • 4.5 करोड़ से अधिक मामले लंबित
  • प्रति 10 लाख आबादी पर सिर्फ 19 जज
  • औसतन 10 साल में फैसला

ई-कोर्ट, पुलिस सुधार और न्यायिक जवाबदेही अभी भी अधूरी हैं।

युवा बेरोजगारी और किसान संकट

  • युवा बेरोजगारी दर: 23%
  • ग्रामीण युवा कौशलहीन
  • किसान आत्महत्या—पंजाब, महाराष्ट्र, विदर्भ में गंभीर

जलवायु परिवर्तन, बाढ़-सूखा और MSP विवाद ने संकट गहरा दिया है।

अभिव्यक्ति की आज़ादी और लोकतंत्र

  • UAPA और IT नियमों का दुरुपयोग
  • पत्रकार जेलों में
  • सोशल मीडिया सेंसरशिप बढ़ती हुई

लोकतंत्र बिना सवाल पूछने की आज़ादी के अधूरा है।

संभावित समाधान:

  • ब्लॉकचेन आधारित पारदर्शी मतदान
  • 1000 फास्ट-ट्रैक कोर्ट
  • हर ज़िले में साइबर क्राइम सेल
  • आपराधिक उम्मीदवारों पर आजीवन प्रतिबंध
  • राजनीतिक दलों का अनिवार्य ऑडिट
  • 50,000 नए जज, समयबद्ध न्याय
  • राष्ट्रीय युवा सेवा इंटर्नशिप
  • पंचायती राज और महिला आरक्षण को सशक्त करना
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