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संघ कहेगा तो छोड़ दूंगा पद, पर काम से नहीं लूंगा संन्यास: RSS प्रमुख मोहन भागवत

By Aditi Pandey

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RSS chief Mohan Bhagwat Statement

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सोशल संवाद/डेस्क: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने अपने पद, संगठन की परंपराओं और भविष्य को लेकर कई अहम बातें कही हैं। संघ के एक कार्यक्रम के दौरान प्रश्नों का उत्तर देते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि संगठन उनसे पद छोड़ने के लिए कहेगा तो वह तुरंत इस्तीफा दे देंगे, लेकिन समाज और राष्ट्र के लिए काम करना कभी नहीं छोड़ेंगे।

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भागवत ने कहा कि सामान्य रूप से यह धारणा है कि 75 वर्ष की आयु के बाद व्यक्ति को किसी पद पर नहीं रहना चाहिए। उन्होंने बताया कि 75 वर्ष पूरे होने पर उन्होंने स्वयं संघ को इसकी जानकारी दी थी, लेकिन संगठन ने उनसे काम जारी रखने का आग्रह किया। उनके अनुसार संघ में पद से अधिक महत्व जिम्मेदारी और कार्य को दिया जाता है।

संघ के नेतृत्व को लेकर भी उन्होंने महत्वपूर्ण टिप्पणी की। भागवत ने कहा कि संघ प्रमुख का चयन चुनाव से नहीं होता, बल्कि संगठन की परंपरा के अनुसार वरिष्ठ पदाधिकारी मिलकर सबसे योग्य व्यक्ति का चयन करते हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि संघ का नेतृत्व करने वाला व्यक्ति हिंदू होगा, लेकिन उसकी जाति या सामाजिक पृष्ठभूमि चयन का आधार नहीं होती।

अनुसूचित जाति और जनजाति समुदाय से संघ प्रमुख बनने की संभावना पर पूछे गए सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि इस पर कोई निश्चित नियम नहीं है, क्योंकि यह निर्णय परिस्थितियों और चयन करने वालों पर निर्भर करता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि किसी भी समुदाय से होना अयोग्यता नहीं है और योग्यता ही सबसे बड़ा मानदंड है।

संघ के इतिहास से जुड़े एक सवाल पर भागवत ने बताया कि संगठन की शुरुआत ऐसे समाज में हुई थी जहां ब्राह्मण समुदाय की संख्या अधिक थी, इसलिए शुरुआती दौर में संस्थापकों में उनकी संख्या ज्यादा दिखती है। हालांकि, समय के साथ संघ का विस्तार समाज के हर वर्ग तक हुआ है।

प्रचार और जनसंपर्क को लेकर भी उन्होंने अपनी बात रखी। भागवत ने कहा कि अत्यधिक प्रचार से प्रसिद्धि तो मिलती है, लेकिन इससे अहंकार का खतरा भी बढ़ता है। उनका मानना है कि प्रचार उतना ही होना चाहिए जितना आवश्यक हो, ताकि उद्देश्य पर ध्यान बना रहे।

भाषा के मुद्दे पर बोलते हुए संघ प्रमुख ने कहा कि संगठन के कामकाज में भारतीय भाषाओं को प्राथमिकता दी जाएगी। उन्होंने कहा कि अंग्रेजी का ज्ञान उपयोगी है और जहां आवश्यकता होगी वहां इसका प्रयोग भी किया जाएगा, लेकिन अपनी मातृभाषा और भारतीय भाषाओं को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

भागवत के इन बयानों को संगठन की कार्यप्रणाली, नेतृत्व चयन और भविष्य की दिशा के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उनके वक्तव्य से यह संकेत भी मिलता है कि संघ अपनी परंपराओं को बनाए रखते हुए बदलते समय के साथ संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है।

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