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रुपया पहली बार 93 के पार, तेल कीमतें और वैश्विक तनाव से बढ़ा दबाव, रिकॉर्ड गिरावट दर्ज

By Aditi Pandey

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Rupee crosses 93 for the first time रुपया

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सोशल संवाद/डेस्क: वैश्विक स्तर पर बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली के बीच भारतीय रुपया ऐतिहासिक कमजोरी पर पहुंच गया है। शुक्रवार के शुरुआती कारोबार में रुपया पहली बार 93 प्रति डॉलर के स्तर को पार कर गया और नया ऑल-टाइम लो दर्ज किया।

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ट्रेडिंग की शुरुआत ही 92.89-92.90 के रिकॉर्ड निचले स्तर से हुई, जिसके बाद यह और फिसलकर 93.15 के आसपास पहुंच गया। बाजार विशेषज्ञों के मुताबिक, यह गिरावट केवल एक दिन का उतार-चढ़ाव नहीं बल्कि कई वैश्विक और घरेलू कारकों का संयुक्त असर है, जो बाजार में बढ़ती अनिश्चितता को दर्शाता है।

इस गिरावट के पीछे सबसे बड़ा कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल है। ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर बना हुआ है और हाल ही में 119 डॉलर तक भी पहुंच चुका है, जिससे भारत जैसे आयातक देश पर दबाव बढ़ता है। इसके अलावा, वेस्ट एशिया में जारी तनाव ने बाजार की अस्थिरता को और बढ़ा दिया है, जिसका सीधा असर रुपये पर देखने को मिल रहा है। हर 10 डॉलर की बढ़त से भारत का चालू खाता घाटा (CAD) जीडीपी के करीब 0.5 प्रतिशत तक बढ़ सकता है, जो अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का विषय है।

दूसरी ओर, विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली भी रुपये को कमजोर कर रही है। आंकड़ों के अनुसार, इस महीने ही विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजार से 81,000 करोड़ रुपये से ज्यादा की निकासी की है, जो पिछले कई महीनों में सबसे बड़ी बिकवाली मानी जा रही है। पिछले एक साल में रुपया करीब 9 प्रतिशत तक कमजोर हुआ है, जबकि केवल एक महीने में ही इसमें लगभग 3 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है।

विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक मिडिल ईस्ट में तनाव कम नहीं होता और कच्चे तेल की कीमतों में स्थिरता नहीं आती, तब तक रुपये पर दबाव बना रह सकता है। हालांकि, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) हस्तक्षेप के जरिए गिरावट की रफ्तार को धीमा कर सकता है, लेकिन मौजूदा ट्रेंड को पूरी तरह पलटना फिलहाल मुश्किल नजर आ रहा है। तकनीकी विश्लेषण के अनुसार, यदि रुपया 93 के ऊपर टिकता है तो आने वाले समय में यह और कमजोर होकर 93.20 से 93.40 के स्तर तक जा सकता है।

कुल मिलाकर, रुपये की यह गिरावट वैश्विक आर्थिक दबावों, महंगे कच्चे तेल और विदेशी निवेशकों के आउटफ्लो का संयुक्त परिणाम है, और जब तक इन कारकों में सुधार नहीं होता, तब तक बाजार में स्थिरता की उम्मीद करना कठिन बना रहेगा।

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