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राष्ट्रीय सम्मान से चमका सरायकेला, छऊ कलाकारों के अभिनंदन समारोह में उमड़ा गौरव

By Riya Kumari

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राष्ट्रीय सम्मान से चमका सरायकेला, छऊ कलाकारों के अभिनंदन समारोह में उमड़ा गौरव
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सोशल संवाद / डेस्क : विश्व प्रसिद्ध सरायकेला छऊ कला को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाने वाले प्रतिष्ठित छऊ मुखौटा शिल्पकार गुरु सुशांत कुमार महापात्र और युवा छऊ कलाकार कुना सामल का गुरुवार को नगर पंचायत कार्यालय में भव्य सम्मान समारोह आयोजित कर अभिनंदन किया गया। दोनों कलाकारों को छऊ कला के संरक्षण, संवर्धन और उत्कृष्ट योगदान के लिए सम्मानित किया गया।

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कार्यक्रम में नगर पंचायत अध्यक्ष मनोज कुमार चौधरी ने दोनों कलाकारों को शॉल और सम्मान प्रतीक भेंट कर सम्मानित किया। उन्होंने कहा कि संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार-2025 के लिए गुरु सुशांत कुमार महापात्र तथा उस्ताद बिस्मिल्लाह खान युवा पुरस्कार के लिए कुना सामल का चयन पूरे सरायकेला, झारखंड और छऊ कला जगत के लिए गर्व का विषय है।

उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि केवल दो कलाकारों की नहीं, बल्कि सरायकेला की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और छऊ कला की वैश्विक पहचान का सम्मान है। नगर पंचायत अध्यक्ष ने बताया कि कलाकारों के हित में राजकीय छऊ नृत्य कला केंद्र को और सशक्त बनाने, प्रशिक्षकों की नियुक्ति, बहुउद्देशीय कला भवन निर्माण तथा कलाकार पेंशन योजना जैसे कई प्रस्तावों पर कार्य अंतिम चरण में है।

कार्यक्रम का संचालन सरायकेला छऊ आर्टिस्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष भोला मोहन्ती ने किया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्तर पर मिलने वाले ऐसे सम्मान युवा कलाकारों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं और इससे छऊ कला को नई दिशा एवं पहचान मिलेगी।

समारोह में पद्मश्री सम्मानित छऊ गुरु शशधर आचार्य, वरिष्ठ कलाकार तपन पटनायक, बजेन्द्र पटनायक, मनोरंजन साहू समेत बड़ी संख्या में कलाकार, गुरुजन, कला प्रेमी और गणमान्य नागरिक मौजूद रहे।

वक्ताओं ने अपने संबोधन में कहा कि सरायकेला छऊ केवल एक नृत्य शैली नहीं, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक अस्मिता और पहचान का जीवंत प्रतीक है। राष्ट्रीय स्तर पर कलाकारों को मिल रहे सम्मान इस बात का प्रमाण हैं कि सरायकेला की छऊ परंपरा अपनी मौलिकता, रचनात्मकता और कलात्मक उत्कृष्टता के कारण आज भी देश-दुनिया में विशेष स्थान रखती है।

कार्यक्रम के अंत में दोनों सम्मानित कलाकारों को उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएं दी गईं और छऊ कला की गौरवशाली परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने तथा इसके संरक्षण एवं संवर्धन के लिए सामूहिक संकल्प लिया गया।

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