सोशल संवाद/डेस्क : स्थायी समिति की अध्यक्ष सत्या शर्मा ने चांदनी चौक स्थित ऐतिहासिक टाउन हॉल भवन के संरक्षण एवं एडैप्टिव रीयूज से जुड़े विस्तृत प्रस्ताव को मंजूरी प्रदान कर दी है। उन्होंने कहा कि यह परियोजना दिल्ली की विरासत को संरक्षित करते हुए उसे आधुनिक स्वरूप में जनता के लिए पुनर्जीवित करने की एक महत्वपूर्ण पहल है।
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सत्या शर्मा ने बताया कि दिल्ली नगर निगम के स्वामित्व वाला यह 160 वर्ष पुराना टाउन हॉल भवन वर्ष 1861-66 के बीच ‘दिल्ली इंस्टीट्यूट’ के रूप में निर्मित हुआ था, जिसे 1866 में नगर निगम मुख्यालय में परिवर्तित किया गया। वर्ष 1935-39 के दौरान इसका विस्तार कर इसे दो मंजिला भवन के रूप में विकसित किया गया, जिसमें पूर्वी, पश्चिमी और दक्षिणी विंग शामिल हैं। वर्ष 2012 तक यह भवन निगम मुख्यालय रहा, लेकिन उसके बाद से यह परिसर काफी हद तक खाली और अनुपयोगी पड़ा है।
उन्होंने कहा कि यह इमारत दिल्ली सरकार द्वारा अधिसूचित ग्रेड-1 हेरिटेज संरचना है, जो संरक्षण की सर्वोच्च श्रेणी में आती है। ऐसे में इसका पुनर्विकास पूरी तरह वैज्ञानिक तरीके और हेरिटेज मानकों के अनुरूप किया जाएगा, ताकि इसकी ऐतिहासिक पहचान अक्षुण्ण बनी रहे।
सत्या शर्मा ने बताया कि 11 फरवरी 2026 को एमसीडी आयुक्त द्वारा साइट निरीक्षण किया गया, जिसमें इस परिसर के समग्र पुनर्विकास के लिए विशेषज्ञ एजेंसियों के सहयोग से कार्य करने के निर्देश दिए गए। इसके बाद दिल्ली पर्यटन एवं परिवहन विकास निगम (DTTDC) से संपर्क किया गया, जिसने इस परियोजना के लिए “टाउन हॉल इमर्सिव म्यूजियम एवं इंटरप्रिटेशन सेंटर” का कॉन्सेप्ट प्रस्ताव प्रस्तुत किया।
उन्होंने कहा कि 2 मार्च 2026 को आयोजित बैठक में इस प्रस्ताव पर विस्तृत चर्चा हुई, जिसके बाद DTTDC ने 17 मार्च 2026 को पत्र के माध्यम से परियोजना के लिए इन-प्रिंसिपल मंजूरी का अनुरोध किया। यह प्रस्ताव भारत सरकार के “नेशनल मिशन फॉर डेवलपिंग फिफ्टी ग्लोबली कम्पेटिटिव टूरिज्म डेस्टिनेशन” के तहत पीएलआई आधारित डेस्टिनेशन मैनेजमेंट कॉन्सेप्ट के अनुरूप तैयार किया गया है।
सत्या शर्मा के अनुसार, प्रस्ताव के तहत टाउन हॉल को एक आधुनिक इमर्सिव म्यूजियम और इंटरप्रिटेशन सेंटर के रूप में विकसित किया जाएगा, जिसमें शाहजहानाबाद और टाउन हॉल के इतिहास को इंटरएक्टिव गैलरी, आर्काइव डिस्प्ले, डिजिटल तकनीक और मल्टीलिंगुअल सेवाओं के माध्यम से प्रस्तुत किया जाएगा। इसके साथ ही शैक्षणिक कार्यक्रम, गाइडेड हेरिटेज वॉक, सार्वजनिक सहभागिता गतिविधियां, सांस्कृतिक कार्यक्रम, हेरिटेज रिटेल और फूड एंड बेवरेज सुविधाएं भी विकसित की जाएंगी।
उन्होंने बताया कि इस परियोजना को “डेवलप-ऑपरेट-मेंटेन मॉडल के तहत लागू किया जाएगा। इसमें एमसीडी पर कोई पूंजीगत व्यय नहीं आएगा, जबकि स्वामित्व और नियंत्रण पूरी तरह एमसीडी के पास ही रहेगा। परियोजना के क्रियान्वयन के लिए एमसीडी, DTTDC और कंसेशनायर के बीच त्रिपक्षीय समझौता किया जाएगा। ऑपरेटर को राजस्व सृजन और संचालन की जिम्मेदारी दी जाएगी, जबकि हेरिटेज संरक्षण मानकों का पालन अनिवार्य होगा।
सत्या शर्मा ने बताया कि परियोजना से राजस्व के प्रमुख स्रोतों में संग्रहालय प्रवेश शुल्क, हेरिटेज सर्किट पैकेज, सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए स्थल किराया, हेरिटेज रिटेल और फूड एंड बेवरेज सेवाएं शामिल होंगी।
उन्होंने कहा कि यह परियोजना लगभग 36 महीनों में चार चरणों में पूरी की जाएगी। पहले चरण (1-8 माह) में संरचनात्मक आकलन, कंजरवेशन प्लान, रूट मैपिंग और हितधारकों से परामर्श किया जाएगा। दूसरे चरण (9-20 माह) में संरक्षण कार्यों का क्रियान्वयन और वित्तीय मॉडल तैयार किया जाएगा। तीसरे चरण (21-30 माह) में म्यूजियम फिट-आउट, डिजिटल इंटरप्रिटेशन, गैलरी विकास और स्टाफ प्रशिक्षण होगा। चौथे चरण (33 माह के बाद) में परियोजना का सार्वजनिक उद्घाटन, हेरिटेज सर्किट लॉन्च और संचालन शुरू किया जाएगा।
सत्या शर्मा ने स्पष्ट किया कि परियोजना की कुल लागत, फंडिंग व्यवस्था, राजस्व साझेदारी, संचालन एवं रखरखाव की जिम्मेदारियां और कंसेशन अवधि जैसे पहलुओं को विस्तृत अध्ययन, व्यवहार्यता विश्लेषण और सभी हितधारकों के परामर्श के बाद अंतिम रूप दिया जाएगा। इसके लिए DTTDC को डीपीआर तैयार करने, तकनीकी एवं वित्तीय व्यवहार्यता अध्ययन करने, पीपीपी/DOM मॉडल तैयार करने, राजस्व संरचना विकसित करने और नेशनल मिशन के तहत प्रस्ताव प्रस्तुत करने की अनुमति दी गई है।
उन्होंने कहा कि यह मॉडल एमसीडी के लिए कम जोखिम और अधिक प्रभाव वाला साबित होगा, जिससे बिना वित्तीय बोझ के एक ऐतिहासिक धरोहर का संरक्षण और पुनर्जीवन संभव होगा। इससे चांदनी चौक में पर्यटन और फुटफॉल बढ़ेगा, स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलेगा और निगम के लिए स्थायी राजस्व के नए स्रोत विकसित होंगे।
सत्या शर्मा ने कहा कि टाउन हॉल का यह पुनर्विकास दिल्ली की सांस्कृतिक विरासत को नई पहचान देगा और आने वाली पीढ़ियों के लिए इसे संरक्षित एवं जीवंत बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।









