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जयराम रमेश, संसद सदस्य, महासचिव (CREA) भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा जारी बयान

By Riya Kumari

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जयराम रमेश, संसद सदस्य, महासचिव (संचार) भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा जारी बयान

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सोशल संवाद / डेस्क : सेंटर फ़ॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA) के एक नए विश्लेषण ने अब उस सच्चाई की पुष्टि कर दी है, जो लंबे समय से भारत का सबसे खुला रहस्य है- कि वायु गुणवत्ता पूरे देश में एक संरचनात्मक संकट है, और इस पर सरकार की प्रतिक्रिया बेहद अप्रभावी और अपर्याप्त है।

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सैटेलाइट डेटा के आधार पर किए गए इस अध्ययन में सामने आया है कि भारत के लगभग 44 प्रतिशत शहर-यानी आकलन किए गए 4,041 वैधानिक नगरों में से 1,787 शहर-लगातार वायु प्रदूषण की गंभीर चपेट में हैं। इन शहरों में पाँच वर्षों (2019–2024, 2020 को छोड़कर) के दौरान हवा में वार्षिक PM2.5 का स्तर लगातार राष्ट्रीय मानकों से ऊपर बना रहा है।

रिपोर्ट ने राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) की अक्षमता को भी उजागर किया है। समस्या के विशाल पैमाने (1,787 शहर) के बावजूद, NCAP के तहत केवल 130 शहरों को शामिल किया गया है। इन 130 शहरों में से 28 में अब तक कंटीन्यूअस एम्बिएंट एयर क्वालिटी मॉनिटरिंग स्टेशन (CAAQMS) भी नहीं हैं। जिन 102 शहरों में निगरानी की व्यवस्था है, उनमें से 100 शहरों में PM10 का स्तर 80 प्रतिशत या उससे अधिक दर्ज किया गया। कुल मिलाकर, NCAP इस समय भारत के केवल 4 प्रतिशत गंभीर रूप प्रदूषित शहरों को ही कवर करता है।

जिस NCAP को नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम के रूप में प्रचारित किया जा रहा है, वह वास्तव में एक अलग ही किस्म का NCAP बन गया है- नोशनल  क्लीन एयर प्रोग्राम। अब इसकी गहन समीक्षा, व्यापक सुधार और पुनर्गठन की सख़्त ज़रूरत है।

● पहला कदम यह स्वीकार करना होना चाहिए कि भारत के बड़े हिस्सों में वायु प्रदूषण से जुड़ा एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट मौजूद है। इसी संकट को ध्यान में रखते हुए अब एयर पॉल्यूशन (कंट्रोल एंड प्रिवेंशन) एक्ट, 1981 और नवंबर 2009 में लागू किए गए नेशनल एम्बिएंट एयर क्वालिटी स्टैंडर्ड्स (NAAQS) की पूरी तरह से पुनर्समीक्षा और व्यापक सुधार किया जाना ज़रूरी है।

NAAQS के अनुसार सूक्ष्म कण पदार्थ (फाइन पार्टिकुलेट मैटर) की स्वीकार्य सांद्रता (Permissible concentration) 24 घंटे की अवधि के लिए 60 µg/m3 और वार्षिक आधार पर 40 µg/m3 तय की गई है। इसके विपरीत, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के दिशा-निर्देश 24 घंटे के लिए 15 µg/m3 से कम और वार्षिक स्तर पर मात्र 5 µg/m3 की सीमा निर्धारित करते हैं।

● सरकार को NCAP के तहत उपलब्ध कराए जाने वाले फंड में बड़े पैमाने पर वृद्धि करनी होगी।

वर्तमान बजट-जिसमें NCAP की फंडिंग और 15वें वित्त आयोग की अनुदान राशि शामिल है-लगभग 10,500 करोड़ रुपये है, जो 131 शहरों में बाँटा गया है। हमारे शहरों को इससे कम से कम 10–20 गुना अधिक फंडिंग की आवश्यकता है। NCAP को 25,000 करोड़ रुपये का कार्यक्रम बनाया जाना चाहिए और इसे देश के सबसे अधिक प्रदूषित 1,000 शहरों/कस्बों तक विस्तारित किया जाना चाहिए।

● NCAP को अपने प्रदर्शन का पैमाना PM2.5 के स्तर को बनाना चाहिए।

● NCAP को अपने ध्यान को प्रमुख प्रदूषण स्रोतों पर केंद्रित करना चाहिए – ठोस ईंधनों का जलना, वाहन उत्सर्जन, और औद्योगिक उत्सर्जन।

● NCAP को क़ानूनी आधार दिया जाना चाहिए, उसके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए मज़बूत प्रवर्तन व्यवस्था (enforcement mechanism) होनी चाहिए, और केवल “नॉन-अटेनमेंट” शहरों तक सीमित रहने के बजाय देश के हर शहर के लिए गंभीर और सशक्त डेटा निगरानी क्षमता विकसित की जानी चाहिए।

● कोयला आधारित बिजली संयंत्रों के लिए तय वायु प्रदूषण मानकों को तत्काल प्रभाव से लागू किया जाना चाहिए। सभी बिजली संयंत्रों में वर्ष 2026 के अंत तक फ़्लू गैस डी-सल्फ़राइज़र (FGD) अनिवार्य रूप से स्थापित किए जाने चाहिए।

● नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) की स्वतंत्रता को बहाल किया जाना चाहिए, और पिछले 10 वर्षों में किए गए जन-विरोधी पर्यावरण क़ानूनों के संशोधनों को वापस लिया जाना चाहिए।

अब तक संसद में दो बार-पहली बार 29 जुलाई 2024 को और दूसरी बार 9 दिसंबर 2025 को-मोदी सरकार ने वायु प्रदूषण के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव को कमतर दिखाने की कोशिश की है। मोदी सरकार सच से अनजान नहीं है, बल्कि वह अपनी अक्षमता और लापरवाही के पैमाने को छिपाने का प्रयास कर रही है।

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