सोशल संवाद/डेस्क: Covid-19 महामारी के दौरान दर्ज किए गए मामूली और तकनीकी मामलों के आधार पर पासपोर्ट आवेदन अस्वीकृत किए जाने को लेकर गंभीर चिंता जताई गई है। छात्रों और आम नागरिकों के पासपोर्ट आवेदन स्थानीय पुलिस सत्यापन के स्तर पर प्रतिकूल रिपोर्ट के कारण रोके जा रहे हैं, जिससे उन्हें भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।

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बताया गया कि महामारी के दौरान लॉकडाउन उल्लंघन, मास्क न पहनने या आवागमन प्रतिबंध तोड़ने जैसे मामलों में अनेक लोगों पर प्राथमिकी दर्ज हुई थी। ये सभी मामले नियामक प्रकृति के थे, जिनमें न तो आपराधिक मंशा थी और न ही नैतिक अधमता का कोई तत्व। इसके बावजूद, केवल इन मामलों के लंबित होने के आधार पर पासपोर्ट अधिनियम, 1967 की धारा 5(2)(e) लागू कर पासपोर्ट आवेदन अस्वीकृत किए जा रहे हैं, जबकि किसी भी सक्षम न्यायालय ने विदेश यात्रा पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया है।
यह भी कहा गया कि यह प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थापित विधिक सिद्धांतों के विपरीत है। Mahesh Kumar Agarwal बनाम भारत संघ (2025 INSC 1476) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि केवल आपराधिक कार्यवाही लंबित होने के आधार पर पासपोर्ट जारी या नवीनीकरण से इनकार नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब न्यायालय ने विदेश यात्रा पर कोई रोक न लगाई हो।
न्यायालय ने यह भी दोहराया कि विदेश यात्रा का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा है और उस पर लगाए गए प्रतिबंध युक्तिसंगत और आनुपातिक होने चाहिए। पासपोर्ट प्राधिकारी को यह अधिकार नहीं है कि वह न्यायालयों के जोखिम-मूल्यांकन को पुनः परखे या अनुमान के आधार पर निर्णय ले।
मामले में मांग की गई है कि कोविड-19 से जुड़े मामूली और तकनीकी उल्लंघनों को पासपोर्ट अस्वीकृति का आधार न बनाया जाए। साथ ही यह सुनिश्चित किया जाए कि प्रतिकूल पुलिस सत्यापन रिपोर्ट केवल गंभीर और प्रासंगिक मामलों में ही दी जाए तथा पासपोर्ट प्राधिकारी यह जांच केवल इसी बिंदु तक सीमित रखें कि क्या किसी न्यायालय ने स्पष्ट रूप से विदेश यात्रा पर रोक लगाई है।
ऐसे दिशा-निर्देश जारी होने से छात्रों के शैक्षणिक भविष्य, नागरिकों के रोजगार, चिकित्सा, व्यवसाय और पारिवारिक आवश्यकताओं से जुड़ी विदेश यात्राओं में आ रही बाधाओं को दूर किया जा सकेगा और पासपोर्ट अधिनियम के अनुरूप निष्पक्ष प्रशासन सुनिश्चित होगा।










