सोशल संवाद/डेस्क : देश की सर्वोच्च अदालत ने मैसेजिंग ऐप WhatsApp और उसकी पैरेंट कंपनी Meta पर कड़ा रुख अपनाया है। 2021 में लाई गई WhatsApp की प्राइवेसी पॉलिसी को लेकर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि भारतीय यूजर्स के निजी डेटा के साथ किसी भी तरह का समझौता बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। कोर्ट की नाराजगी इतनी तीखी थी कि Meta को यह तक कह दिया गया कि अगर वह भारतीय संविधान और कानून का पालन नहीं कर सकती, तो देश में काम करने का अधिकार भी नहीं है।
ये भी पढे : Instagram Reels Viral Tips: रील्स पर व्यूज नहीं आ रहे? अपनाएं ये स्मार्ट ट्रिक्स और पाएं लाखों व्यूज
क्यों भड़का सुप्रीम कोर्ट?
सुप्रीम कोर्ट में यह मामला WhatsApp की 2021 की प्राइवेसी पॉलिसी से जुड़ा है, जिसके तहत यूजर्स का डेटा Meta की अन्य कंपनियों के साथ शेयर करने की शर्त रखी गई थी। इस पॉलिसी को लेकर सबसे बड़ा विवाद यह था कि यूजर्स को इसे स्वीकार करने के अलावा कोई ठोस विकल्प नहीं दिया गया। यानी “ऑप्ट आउट” का विकल्प लगभग न के बराबर था।

इसी मुद्दे को लेकर भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) ने WhatsApp पर 213.14 करोड़ रुपये का भारी जुर्माना लगाया था। CCI का मानना था कि WhatsApp ने अपने बाजार प्रभुत्व का गलत इस्तेमाल किया और यूजर्स पर पॉलिसी थोप दी।
NCLAT और सुप्रीम कोर्ट तक कैसे पहुंचा मामला?
जनवरी 2025 में नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) ने CCI के आदेश में आंशिक बदलाव करते हुए “प्रभुत्व के दुरुपयोग” वाली बात को हटाया, लेकिन जुर्माने को बरकरार रखा। इसी फैसले को चुनौती देते हुए Meta और WhatsApp सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। अब सुप्रीम कोर्ट इस पूरे मामले की गंभीरता से समीक्षा कर रहा है।
डेटा प्राइवेसी पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने Meta और WhatsApp से सीधा सवाल किया कि जब बाजार में WhatsApp जैसा कोई दूसरा मजबूत विकल्प नहीं है, तो यूजर के पास आपकी पॉलिसी न मानने का विकल्प आखिर कहां बचता है? कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी कंपनी को यह अधिकार नहीं दिया जा सकता कि वह यूजर्स की मजबूरी का फायदा उठाए।

अदालत ने यह भी कहा कि भारत में निजता का अधिकार संविधान के तहत संरक्षित है और कोई भी विदेशी या भारतीय कंपनी इसे नजरअंदाज नहीं कर सकती। कोर्ट ने Meta को चेतावनी देते हुए कहा कि अगर वे भारतीय कानूनों और संविधान का सम्मान नहीं कर सकते, तो यहां कारोबार करने का दावा भी नहीं कर सकते।
CJI का निजी अनुभव भी बना चर्चा का विषय
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने अपना व्यक्तिगत अनुभव साझा किया। उन्होंने कहा कि अगर WhatsApp पर किसी डॉक्टर को बीमारी से जुड़ा संदेश भेजा जाता है, तो उसके बाद उसी तरह के विज्ञापन दिखने लगते हैं। इससे यह सवाल उठता है कि आखिर डेटा का इस्तेमाल किस तरह हो रहा है।

हालांकि WhatsApp की ओर से दलील दी गई कि सभी मैसेज एंड-टू-एंड एन्क्रिप्टेड होते हैं और कंटेंट को पढ़ा नहीं जा सकता, लेकिन कोर्ट इस तर्क से पूरी तरह संतुष्ट नहीं दिखा। अदालत ने कहा कि यूजर्स का भरोसा सबसे अहम है और पॉलिसी इतनी जटिल नहीं होनी चाहिए कि आम आदमी उसे समझ ही न सके।
“पॉलिसी गरीब और आम यूजर के लिए उलझन भरी”
कोर्ट ने Meta की प्राइवेसी पॉलिसी को “गुमराह करने वाली” बताया। अदालत का कहना था कि जब पढ़े-लिखे लोगों को भी इन शर्तों को समझने में दिक्कत होती है, तो एक बुजुर्ग महिला, सड़क किनारे काम करने वाला व्यक्ति या सिर्फ क्षेत्रीय भाषा जानने वाला यूजर इसे कैसे समझ पाएगा?
आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट ने Meta और WhatsApp को निर्देश दिया है कि वे डेटा के इस्तेमाल और सुरक्षा को लेकर एक विस्तृत हलफनामा दाखिल करें। जब तक कंपनियां यह भरोसा नहीं देतीं कि यूजर्स के डेटा का दुरुपयोग नहीं होगा, तब तक मामले की सुनवाई आगे नहीं बढ़ेगी। अगली सुनवाई अगले सप्ताह होने की संभावना है।










