धर्म बदलने पर आरक्षण का लाभ नहीं, धर्मांतरित मुसलमानों को पिछड़े वर्ग का दर्जा देने की अनुमति का मामला

By Tamishree Mukherjee

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The issue of whether to grant 'backward class' status to Muslims who have converted from other religions

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सोशल संवाद/डेस्क : सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि इस्लाम धर्म अपनाने वाला कोई व्यक्ति, धर्म परिवर्तन से पहले की अपनी स्थिति के आधार पर पिछड़े वर्ग के आरक्षण का हकदार नहीं है। शीर्ष अदालत ने मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को बहाल रखते हुए कहा है कि ‘जो व्यक्ति हिंदू सामाजिक व्यवस्था से किसी गैर-हिंदू सामाजिक व्यवस्था में धर्म परिवर्तन करता है, वह केवल धर्म परिवर्तन से पहले की अपनी सामाजिक स्थिति से जुड़े पिछड़ेपन के आधार पर, संविधान के अनुच्छेद 16 (4) के तहत विशेष लाभ का दावा नहीं कर सकता।

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न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति एस. चंद्रशेखर की पीठ ने हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ तमिलनाडु सरकार की अपील खारिज करदी। पीठने अपने फैसले में कहा कि कोई व्यक्ति जो मुस्लिम धर्म अपनाता है, तो केवल इस कार्य से वह राज्य में अधिसूचित सात पिछड़े सामाजिक समुदायों में से किसी एक का सदस्य नहीं बन जाता। उसकी पुरानी जाति की स्थिति को मुस्लिम पिछड़े वर्ग की श्रेणी में नहीं जोड़ा जा सकता और नही कोई निजी धार्मिक संस्था यह तय कर सकती है कि वह व्यक्ति इस तरह के आरक्षणका हकदार है या नहीं।

सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में साफ किया है कि पुरानी सामाजिक व्यवस्था के कारण झेला गया पिछड़ापन, अपने आप में, नई सामाजिक व्यवस्था में भी लागू नहीं माना जा सकता, ताकि उस व्यक्ति को वहां पिछड़े वर्ग का दर्जा मिल सके।
पीठ ने फैसले में कहा संविधान (अनुसूचित जातियां) आदेश के तहत, जो व्यक्ति हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म को मानता है, उसे अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जा सकता। इसलिए, किसी ऐसे धर्म में परिवर्तन करने पर जो इस सूची में शामिल नहीं है, उस व्यक्ति का अनुसूचित जाति का दर्जा खत्म हो जाता है। ऐसे में वह अनुच्छेद 16 (4) के तहत उन विशेष लाभों का दावा नहीं कर सकता।

वापस हिंदू बनने पर तथ्यों पर आधारित मूल्यांकन जरूरी

पीठ ने यह भी कहा कि जब कोई व्यक्ति हिंदू सामाजिक व्यवस्था से किसी गैर-हिंदू सामाजिक व्यवस्था में धर्म परिवर्तन कर लेता है और बाद में वापस हिंदू सामाजिक व्यवस्था में आ जाता है, तो उसे मिलने वाले विशेष अधिकारों का निर्धारण केवल उसकी पिछली स्थिति के आधार पर नहीं किया जा सकता। इसके लिए एक स्वतंत्र और तथ्यों पर आधारित मूल्यांकन की जरूरत होती है कि क्या धर्म परिवर्तन के बाद उसकी मूल जाति या सामाजिक पहचान वास्तव में फिर से बहाल हो गई है, और क्या उस व्यक्ति ने संवैधानिक और कानूनी शतों को पूरा किया है।

यह था मामला :

मद्रास हाईकोर्ट ने 2024 में जारी एक सरकारी आदेश को असंवैधानिक घोषित कर दिया था। इस आदेश में यह प्रावधान था कि यदि कोई व्यक्ति पिछड़े वर्गों, अति पिछड़े वर्गों, विमुक्त समुदायों या एससी से इस्लाम में परिवर्तित होता है, तो उसे पिछड़ा (मुस्लिम) माना जाएगा। साथ ही, आरक्षण लाभके लिए सात अधिसूचित मुस्लिम समुदायों में से किसी एक का सामुदायिक प्रमाण पत्र जारी किया जा सकता था। तमिलनाडु पिछड़े वर्ग, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अधिनियम, 1993 के तहत, मुसलमानों के जिन 7 समूहों को ‘पिछड़े वर्ग के मुस्लिम’ के रूप में अधिसूचित किया गया है, वे हैं – अंसार, दक्कनी मुस्लिम, दुबेकुला, लब्बै (जिसमें रोथर और मरकायर शामिल हैं), माप्पिला, शेख और सैयद।

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