सोशल संवाद/डेस्क : सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि देशभर में निजी अस्पताल मरीजों की सेवा के बजाए मुनाफा कमाने वाले उद्योगों की तरह काम करते हैं। शीर्ष अदालत ने कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों की दवाओं पर मरीजों से 10 गुना अधिक कीमत वसूले जानेको ‘बर्बरता’ करार देते हुए कहा कि इस पर लगाम लगाने की जरूरत है। जस्टिस विक्रमनाथ और संदीप मेहता की पीठ ने कैंसर और दूसरी बीमारियों की दवाओं की अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी), रिटेल को मिलने वाली कीमत (पीटीआर) से 16 फीसदी तक तय करने के लिए कानून बनाने की वकालत की।
यह भी पढे : डीजीपी नियुक्तिः शीर्ष कोर्ट में अब आठ को होगी सुनवाई
पीठ ने सरकार से कहा कि एक ऐसा कानून बनाया जा सकता है, जिसके जरिए यह तय किया जा सकता है कि सभी दवाओं की कीमत एमआरपी, पीटीआर से 16 फीसदी से अधिक न हो। जस्टिस मेहता ने निजी हेल्थकेयर के व्यावसायीकरण की आलोचना करते हुए कहा कि कॉर्पोरेट अस्पताल सेवा देने के बजाय मुनाफा कमाने वाले उद्योगों की तरह काम करते हैं, जबकि आम नागरिक और टैक्स देने वाले लोग दवाओं की कीमत में भारी बढ़ोतरी का बोझ उठाते हैं। जस्टिस नाथ ने कहा कि निजी अस्पताल भर्ती मरीजों को मजबूर करते हैं कि वे दवाएं सिर्फ अस्पताल की फार्मेसी से ही खरीदें। यदि कोई मरीज बाहर से दवाएं लाते हैं, उन्हें इलाज का भरोसा देने से अस्पताल मना कर देते हैं, जिससे वे मुश्किल में पड़ जाते हैं।
किसी को नहीं छोड़ते, शव भी नहीं ले जाने देते हैं
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कैंसर की दवा रिटेलर को 2,700 रुपये में सप्लाई की जाती है, लेकिन उसकी एमआरपी 27,000 रुपये रखी जाती है। शीर्ष अदालत ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा कि कॉर्पोरेट अस्पताल किसी को नहीं छोड़ते। वे तो शव तक को बाहर नहीं ले जाने देते। फार्मा सेक्टर को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। सुप्रीम कोर्ट में औषधि (मूल्य नियंत्रण) आदेश (डीपीसीओ), 2013 के तहत दवाओं की कीमतों के नियमन, जेनेरिक दवाओं के प्रिस्क्रिप्शन की मांग वाली अर्जी पर सुनवाई हो रही है।











