सोशल संवाद / डेस्क : झारखंड की समृद्ध लोक और जनजातीय कला-संस्कृति को संरक्षित करने के उद्देश्य से डीबीएमएस कॉलेज ऑफ एजुकेशन के कल्चरल क्लब की ओर से अबीरा आर्ट्स के सहयोग से 21 और 22 अगस्त को दो दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला में विभिन्न महाविद्यालयों से आए करीब 100 प्रतिभागियों ने उत्साह के साथ हिस्सा लिया।
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कार्यशाला के रिसोर्स पर्सन और प्रसिद्ध सोरा कला कलाकार सोना राम सोरेन ने प्रतिभागियों को सोरा कला की पारंपरिक तकनीकों, बारीकियों और इसके सांस्कृतिक महत्व के बारे में जानकारी दी। सोना राम सोरेन को सोरा कला के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए कई पुरस्कार और सम्मान मिल चुके हैं।
उन्होंने प्रतिभागियों को बताया कि सोरा और सोहराय कला अलग-अलग लोककलाएं हैं। सोरा कला में मुख्य रूप से प्रकृति, पशु-पक्षियों और पारंपरिक प्रतीकों को चित्रों के माध्यम से दर्शाया जाता है। वहीं सोहराय कला में मानव जीवन और सामाजिक-सांस्कृतिक भावनाओं के साथ स्त्री-पुरुष आकृतियों का चित्रण प्रमुखता से देखने को मिलता है।
सोना राम सोरेन ने कहा कि समय के साथ लोककलाओं में कई बदलाव और नए प्रयोग हुए हैं, लेकिन पारंपरिक कला की मूल पहचान को सुरक्षित रखना बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा कि लोककलाएं सिर्फ चित्र बनाने की तकनीक नहीं हैं, बल्कि इनमें किसी समाज की स्मृतियां, परंपराएं, प्रकृति से जुड़ाव और सांस्कृतिक पहचान भी दिखाई देती है। इसलिए इन कलाओं को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना सभी की जिम्मेदारी है।
इस मौके पर अबीरा आर्ट्स की संस्थापक श्वेता सिंह भी मौजूद रहीं। अबीरा आर्ट्स की ओर से झारखंड की पारंपरिक और विलुप्त होती कलाओं के संरक्षण के साथ कलाकारों को प्रोत्साहित करने तथा युवाओं को इन कलाओं से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।
दो दिवसीय कार्यशाला के दौरान प्रतिभागियों को सोरा कला की पारंपरिक तकनीकों का प्रैक्टिकल प्रशिक्षण भी दिया गया। प्रतिभागियों ने स्वयं कलाकृतियां बनाकर इस लोककला को करीब से समझा और उसके विभिन्न पहलुओं का अनुभव किया। कार्यक्रम के समापन पर प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र और स्मृति-चिह्न देकर सम्मानित किया गया।
कार्यशाला के सफल आयोजन में डॉ. बी. चंद्रशेखर, श्रीमती श्रीप्रिया धर्मराजन, श्रीमती सुधा दिलीप, एडवाइजर एवं मेंटर डॉ. जूही समर्पिता, प्राचार्या डॉ. मोनिका उप्पल, वाइस-प्रिंसिपल श्रीमती पामेला घोष दत्ता और कल्चरल क्लब की प्रमुख श्रीमती अमृता चौधरी का महत्वपूर्ण योगदान रहा। कॉलेज के शिक्षकों ने भी आयोजन को सफल बनाने में सक्रिय भूमिका निभाई।
कार्यक्रम का संचालन रश्मि, औयोना, श्रद्धा टोपनो और आर्तिका ने किया।
कार्यशाला का समापन झारखंड की समृद्ध लोक एवं जनजातीय कला परंपराओं के संरक्षण, उन्हें युवा पीढ़ी तक पहुंचाने और राज्य की सांस्कृतिक पहचान को और मजबूत बनाने के संकल्प के साथ हुआ।









