दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा क्यों नहीं मिला? 70 साल में कई बार बदली सत्ता, जानिए पूरी कहानी

By Riya Kumari

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दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा क्यों नहीं मिला? 70 साल में कई बार बदली सत्ता, जानिए पूरी कहानी

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सोशल संवाद / डेस्क : देश की राजधानी दिल्ली में संसद, राष्ट्रपति भवन और केंद्र सरकार के बड़े मंत्रालय हैं। यहां अपनी चुनी हुई सरकार, मुख्यमंत्री और विधानसभा भी है, लेकिन इसके बावजूद दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा हासिल नहीं है। यही वजह है कि दिल्ली की प्रशासनिक व्यवस्था देश के अन्य राज्यों से अलग है। 1 नवंबर 2026 को दिल्ली के केंद्रशासित प्रदेश बनने के 70 साल पूरे हो गए। इस मौके पर दिल्ली के राजनीतिक और संवैधानिक सफर को समझना जरूरी है।

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1952 में बनी थी दिल्ली की पहली निर्वाचित सरकार

आजादी के बाद 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के साथ दिल्ली को पार्ट-C राज्य का दर्जा मिला। इसके बाद 7 मार्च 1952 को दिल्ली की पहली विधानसभा गठित हुई, जिसमें 48 सदस्य थे। चौधरी ब्रह्म प्रकाश दिल्ली के पहले मुख्यमंत्री बने। हालांकि, मुख्यमंत्री और मुख्य आयुक्त के बीच प्रशासनिक अधिकारों को लेकर मतभेद सामने आने लगे। 12 फरवरी 1955 को ब्रह्म प्रकाश ने इस्तीफा दे दिया। उनके बाद गुरुमुख निहाल सिंह दिल्ली के दूसरे मुख्यमंत्री बने।

1956 में क्यों खत्म हुई विधानसभा?

देश में राज्यों के पुनर्गठन की प्रक्रिया के दौरान राज्य पुनर्गठन आयोग ने दिल्ली की प्रशासनिक व्यवस्था की समीक्षा की। आयोग का मानना था कि देश की राजधानी होने के कारण दिल्ली का प्रशासन सामान्य राज्यों से अलग होना चाहिए। यहां केंद्र सरकार की विशेष भूमिका जरूरी है, ताकि केंद्र और स्थानीय सरकार के बीच अधिकारों का टकराव न बढ़े।

आयोग की सिफारिशों के आधार पर राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 लागू हुआ। 1 नवंबर 1956 को दिल्ली का पार्ट-C राज्य का दर्जा समाप्त कर इसे केंद्रशासित प्रदेश बना दिया गया। इसके साथ ही विधानसभा और मुख्यमंत्री की व्यवस्था भी खत्म हो गई।

1993 में फिर लौटी विधानसभा और मुख्यमंत्री की व्यवस्था

विधानसभा खत्म होने के बाद 1966 में दिल्ली प्रशासन अधिनियम के तहत महानगर परिषद बनाई गई। इसमें निर्वाचित सदस्य तो थे, लेकिन कानून बनाने के अधिकार नहीं थे।

बाद में 1987 में गठित बालकृष्णन समिति ने दिल्ली को केंद्रशासित प्रदेश बनाए रखते हुए विधानसभा और मंत्रिपरिषद बनाने की सिफारिश की। इसके आधार पर 1991 में 69वां संविधान संशोधन पारित हुआ। दिल्ली को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCT) का दर्जा मिला और विधानसभा तथा मंत्रिपरिषद की वापसी का रास्ता खुला। नवंबर 1993 में चुनाव हुए और मदन लाल खुराना मुख्यमंत्री बने। इस तरह करीब 37 साल बाद दिल्ली में निर्वाचित सरकार वापस आई।

दिल्ली में मुख्यमंत्री और उपराज्यपाल के अधिकार कैसे बंटे हैं?

दिल्ली की मौजूदा व्यवस्था में संविधान का अनुच्छेद 239AA अहम भूमिका निभाता है। इसके तहत दिल्ली सरकार शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, पानी और परिवहन जैसे कई विषयों पर नीतियां बना सकती है। वहीं पुलिस, सार्वजनिक व्यवस्था और जमीन जैसे महत्वपूर्ण विषय केंद्र सरकार के नियंत्रण में हैं।

यही व्यवस्था दिल्ली को दूसरे राज्यों से अलग बनाती है। यहां मुख्यमंत्री के नेतृत्व वाली निर्वाचित सरकार और उपराज्यपाल की भूमिका के बीच संवैधानिक शक्तियों का बंटवारा है।

अधिकारों को लेकर केंद्र और दिल्ली सरकार में विवाद

दिल्ली में निर्वाचित सरकार और केंद्र के बीच अधिकारों को लेकर समय-समय पर विवाद सामने आते रहे हैं। 11 मई 2023 को सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस, जमीन और सार्वजनिक व्यवस्था को छोड़कर अधिकारियों की नियुक्ति और तबादले का अधिकार दिल्ली सरकार को दिया था। इसके बाद 19 मई 2023 को केंद्र सरकार अध्यादेश लेकर आई, जिसमें अधिकारियों की नियुक्ति और तबादले से जुड़े मामलों के लिए राष्ट्रीय राजधानी सिविल सेवा प्राधिकरण का प्रावधान किया गया।

दिल्ली पूर्ण राज्य क्यों नहीं है?

दिल्ली देश की राजधानी है और यहां संसद, राष्ट्रपति भवन तथा केंद्र सरकार के प्रमुख कार्यालय स्थित हैं। इसी कारण केंद्र सरकार राजधानी के प्रशासन, सुरक्षा और जमीन जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर अपना नियंत्रण बनाए रखना चाहती है। दूसरी ओर, दिल्ली में रहने वाले लोगों की स्थानीय जरूरतों के लिए निर्वाचित सरकार भी काम करती है।

इसी दोहरी भूमिका के कारण दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं दिया गया है। 70 साल के इस सफर में दिल्ली की सत्ता व्यवस्था कई बार बदली, लेकिन केंद्रशासित प्रदेश के रूप में इसकी विशेष संवैधानिक पहचान आज भी कायम है।

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