सोशल संवाद/डेस्क : रक्तदान को जीवन बचाने वाला सबसे बड़ा दान माना जाता है। किसी दुर्घटना, ऑपरेशन या गंभीर बीमारी की स्थिति में रक्त की उपलब्धता कई बार मरीज की जिंदगी बचा सकती है। लेकिन भारत में ब्लड डोनेशन से जुड़े कुछ नियम लंबे समय से बहस का विषय बने हुए हैं। खासकर ट्रांसजेंडर और समलैंगिक समुदाय के लोगों को रक्तदान की अनुमति न दिए जाने को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं।
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भारत में ब्लड डोनेशन से जुड़े नियम National Blood Transfusion Council (NBTC) द्वारा तय किए जाते हैं। साल 2017 में जारी की गई गाइडलाइन में कुछ विशेष समूहों को रक्तदान के लिए अयोग्य माना गया था। इनमें ट्रांसजेंडर व्यक्ति, पुरुषों के साथ यौन संबंध रखने वाले पुरुष और महिला सेक्स वर्कर्स जैसे समूह शामिल हैं।
गाइडलाइन में क्या कहा गया है?
गाइडलाइन के अनुसार ब्लड डोनर ऐसा व्यक्ति होना चाहिए जिसे HIV, हेपेटाइटिस बी या हेपेटाइटिस सी जैसे संक्रमण का जोखिम न हो। इसी आधार पर कुछ समूहों को “उच्च जोखिम” श्रेणी में रखा गया है और उन्हें रक्तदान से बाहर रखा गया है।
सरकार का तर्क है कि यह फैसला किसी व्यक्ति की पहचान या अधिकारों के खिलाफ नहीं बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य की सुरक्षा को ध्यान में रखकर लिया गया है। सरकार का कहना है कि असुरक्षित यौन संबंधों के कारण कुछ समूहों में HIV संक्रमण का खतरा अपेक्षाकृत अधिक पाया गया है, इसलिए मरीजों को सुरक्षित रक्त उपलब्ध कराना प्राथमिकता है।
अदालत में भी पहुंचा मामला
इन नियमों के खिलाफ 2021 में ट्रांसजेंडर अधिकार कार्यकर्ता Thangjam Santa Singh ने याचिका दायर की थी। याचिका में कहा गया कि ब्लड बैंक में जमा होने वाले रक्त की कई तरह की मेडिकल जांच होती है, जिसमें HIV और हेपेटाइटिस जैसी बीमारियों की जांच भी शामिल होती है।
याचिकाकर्ता पक्ष का कहना है कि जब रक्त की पूरी तरह जांच होती है तो किसी व्यक्ति को सिर्फ उसकी जेंडर पहचान या सेक्शुअल ओरिएंटेशन के आधार पर रक्तदान से रोकना उचित नहीं है। उन्होंने इसे संविधान के समानता के अधिकार के खिलाफ भी बताया। हालांकि केंद्र सरकार ने अदालत में दायर हलफनामे में कहा कि यह प्रतिबंध वैज्ञानिक अध्ययनों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सलाह पर आधारित है। सरकार का तर्क है कि यह व्यक्तिगत अधिकार का मामला नहीं बल्कि मरीजों की सुरक्षा का मुद्दा है।
डॉक्टरों की क्या राय है?
कई डॉक्टरों का मानना है कि ब्लड डोनेशन के मामले में सबसे जरूरी यह है कि डोनर पूरी तरह स्वस्थ हो और उसे कोई ऐसी बीमारी न हो जो खून के जरिए दूसरे व्यक्ति तक पहुंच सकती हो। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक 18 से 65 वर्ष के बीच का कोई भी स्वस्थ व्यक्ति, जिसका हीमोग्लोबिन 12.5 ग्राम प्रति डेसीलीटर से अधिक हो और जिसका वजन कम से कम 50 किलोग्राम हो, वह सामान्य रूप से रक्तदान कर सकता है। कुछ विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि रक्तदान के मामले में किसी व्यक्ति की सेक्शुअलिटी के बजाय उसके स्वास्थ्य और मेडिकल जांच को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
इतिहास में कब शुरू हुई थी यह पाबंदी?
समलैंगिकों के रक्तदान पर पाबंदी की शुरुआत 1980 के दशक में हुई थी, जब दुनिया भर में HIV/AIDS के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी हो रही थी। उस समय इस बीमारी के बारे में बहुत कम जानकारी उपलब्ध थी और संक्रमण रोकने के लिए कई देशों ने सख्त नियम बनाए थे। तब से लेकर आज तक कई देशों में इन नियमों को धीरे-धीरे बदला गया है।
दूसरे देशों में क्या हैं नियम?
अमेरिका में पहले समलैंगिक पुरुषों के रक्तदान पर पूरी तरह प्रतिबंध था। बाद में U.S. Food and Drug Administration (FDA) ने नियमों में बदलाव किया और कुछ शर्तों के साथ रक्तदान की अनुमति दी। 2015 में कहा गया कि अगर किसी पुरुष ने पिछले 12 महीनों में किसी दूसरे पुरुष के साथ यौन संबंध नहीं बनाए हैं तो वह रक्तदान कर सकता है। बाद में इस अवधि को घटाकर 3 महीने कर दिया गया।
ब्रिटेन और कनाडा जैसे देशों में भी अब नियम जेंडर या सेक्शुअल ओरिएंटेशन के आधार पर नहीं बल्कि व्यक्ति के यौन व्यवहार के आधार पर तय किए जाते हैं। वहां रक्तदान से पहले यह पूछा जाता है कि पिछले कुछ महीनों में व्यक्ति के कितने यौन साथी रहे हैं या क्या उसने नया साथी बनाया है।
सुरक्षित रक्त और जागरूकता की जरूरत
भारत में हर साल करोड़ों यूनिट रक्त की जरूरत पड़ती है, लेकिन इसके मुकाबले रक्तदान की दर अभी भी कम है। विशेषज्ञों का मानना है कि सुरक्षित रक्त उपलब्ध कराने के साथ-साथ लोगों को रक्तदान के लिए जागरूक करना भी जरूरी है। ब्लड डोनेशन को लेकर नियमों पर बहस जारी है, लेकिन एक बात साफ है कि मरीजों की सुरक्षा और सुरक्षित रक्त की उपलब्धता स्वास्थ्य व्यवस्था की सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में से एक बनी हुई है।









