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आज बात करते हैं आदिवासी समाज से जुड़े मुद्दों तथा पेसा अधिनियम

By Muskan Thakur

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आज बात करते हैं आदिवासी समाज से जुड़े मुद्दों तथा पेसा अधिनियम
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सोशल संवाद/डेस्क : मुख्यमंत्री के पद पर रहते हुए मैने पेसा अधिनियम की समीक्षा की थी, और पारंपरिक ग्राम सभाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के लिए कुछ विशेष प्रावधान भी जुड़वाए थे। हमने सभी बालू घाटों एवं लघु खनिजों के खनन को ग्राम सभा को सौंपने का प्रस्ताव रखा था, ताकि ग्राम सभा सशक्त हो सके। उसे विधि विभाग की स्वीकृति भी मिल गई, लेकिन डेढ़ साल बाद भी, सरकार पेसा को लागू ही नहीं करना चाहती है।

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पेसा लागू होने के बाद, आदिवासी बहुल गांवों में किसी भी प्रकार की सभा करने अथवा धार्मिक स्थलों का निर्माण करने से पहले ग्राम सभा एवं पारंपरिक ग्राम प्रधान (पाहन, मांझी परगना, मानकी मुंडा, पड़हा राजा आदि) की अनुमति लेनी होगी। इस से ना सिर्फ हमारी पारंपरिक व्यवस्था मजबूत होगी, बल्कि धर्मांतरण भी रुकेगा। लेकिन सरकार को शायद यह मंजूर नहीं है।

आदिवासी संस्कृति का मतलब सिर्फ पूजन पद्धति नहीं, बल्कि संपूर्ण जीवन शैली है। जन्म से लेकर शादी-विवाह एवं मृत्यु तक, हमारे समाज की सभी प्रक्रियाओं को मांझी परगना, पाहन, मानकी मुंडा, पड़हा राजा एवं अन्य पूरा करवाते हैं। जबकि धर्मांतरण के बाद वे लोग सभी प्रक्रियाओं के लिए चर्च में जाते हैं। वहाँ “मरांग बुरु” या “सिंग बोंगा” की पूजा होती है क्या?

अगर इस धर्मांतरण को नहीं रोका गया तो भविष्य के हमारे सरना स्थलों, जाहेर स्थानों, देशाउली आदि में कौन पूजा करेगा? ऐसे तो हमारी संस्कृति ही खत्म हो जायेगी? हमारा अस्तित्व ही मिट जायेगा।

पेसा अधिनियम का लक्ष्य हमारी पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था को सुदृढ़ करना है, और इसे उसी तरह से लागू किया जाना चाहिए। लेकिन इस राज्य में कुछ लोगों को “रूढ़िवादी परम्परा मानने वाले आदिवासियों” के हाथों में शक्ति एवं अधिकार देना मंजूर नहीं है।

पिछले महीने, इस सरकार ने पश्चिमी सिंहभूम जिले में हमारी पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था में सीधा हस्तक्षेप करने का प्रयास किया, जिसके खिलाफ, चाईबासा में “मानकी मुंडा संघ” ने विराट धरना-प्रदर्शन किया। लेकिन प्रदर्शन के बावजूद, सरकार बेपरवाह है।

मेरे कार्यकाल के दौरान, हमने सभी सरकारी स्कूलों में स्थानीय/ आदिवासी भाषाओं में शिक्षा शुरू करने की पहल की थी। लेकिन सरकार बदलते ही, इस प्रक्रिया को रोक दिया गया। क्या आप इसका कारण जानते हैं? अगर आदिवासी समाज का हर व्यक्ति अपनी भाषा, अपने इतिहास एवं अपनी परंपराओं पर गर्व करने लगेगा, तब धर्मांतरण अपने आप रुक जाएगा।

हाल के दिनों में, लगभग हर आदिवासी-बहुल गाँव में शराब की दुकानें खोल रही सरकार का “लक्ष्य” समझना ज्यादा मुश्किल नहीं है। हमारे समाज के युवाओं को नशे में झोंक कर, ये लोग किस का भला करना चाहते हैं? सोचिए और समझिए।

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