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गर्म पानी से स्नान करना चाहिए या नहीं? प्रेमानंद महाराज ने बताया धार्मिक और आयुर्वेदिक कारण

By Muskan Thakur

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गर्म पानी से स्नान करना चाहिए या नहीं?

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सोशल संवाद/डेस्क : सर्दियों का मौसम शुरू होते ही लोग अक्सर ठंड से बचने के लिए गर्म पानी से स्नान करना पसंद करते हैं। लेकिन क्या यह आदत वास्तव में शरीर और मन के लिए सही है? इस विषय पर संत प्रेमानंद महाराज ने अपने प्रवचन में विस्तार से बताया कि गर्म पानी से स्नान करने के फायदे से ज़्यादा नुकसान हो सकते हैं, विशेष रूप से जब यह आदत रोज़ाना की दिनचर्या बन जाए।

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प्रेमानंद महाराज ने कहा कि स्नान का उद्देश्य सिर्फ शरीर को स्वच्छ करना नहीं, बल्कि यह एक आध्यात्मिक और ऊर्जात्मक प्रक्रिया भी है। भारतीय संस्कृति में स्नान को ‘शुद्धि का संस्कार’ कहा गया है, जो शरीर, मन और आत्मा — तीनों की पवित्रता से जुड़ा है। उन्होंने कहा कि जैसे ही व्यक्ति स्नान करता है, शरीर की नाड़ियाँ (energy channels) सक्रिय होती हैं और मन में ताजगी आती है।

गर्म पानी से स्नान क्यों नहीं करना चाहिए

महाराज जी के अनुसार, अत्यधिक गर्म पानी से नहाना शरीर की प्राकृतिक ऊर्जा को कम कर देता है। उन्होंने कहा —

“जब हम गर्म पानी से नहाते हैं, तो शरीर की वह सूक्ष्म ऊर्जा जो मन और आत्मा को संतुलित रखती है, वह कमजोर हो जाती है। इससे व्यक्ति में आलस्य, चिड़चिड़ापन और मानसिक असंतुलन बढ़ने लगता है।”

उन्होंने आगे बताया कि गर्म पानी त्वचा की नमी छीन लेता है, जिससे शरीर में शुष्कता और थकावट महसूस होती है। यह केवल शारीरिक असर नहीं बल्कि मानसिक रूप से भी व्यक्ति को सुस्त बना देता है।

आयुर्वेदिक दृष्टिकोण

आयुर्वेद में भी इस विषय पर विस्तार से लिखा गया है। प्रेमानंद महाराज ने चरक संहिता का हवाला देते हुए कहा कि गर्म पानी सिर और हृदय के लिए हानिकारक है। आयुर्वेद कहता है —

“सिर पर कभी गर्म पानी नहीं डालना चाहिए, क्योंकि इससे आँखों की रोशनी और मानसिक शांति पर प्रभाव पड़ता है।”

उन्होंने कहा कि जिन लोगों को त्वचा रोग, सिर दर्द, उच्च रक्तचाप या हृदय से जुड़ी समस्याएँ हैं, उन्हें कभी भी बहुत गर्म पानी से नहाने से बचना चाहिए।

धार्मिक मान्यता और आध्यात्मिक प्रभाव

प्रेमानंद महाराज ने यह भी बताया कि शास्त्रों में स्नान को एक पूजा समान कर्म बताया गया है। गीता और पुराणों में उल्लेख है कि ठंडे या सामान्य तापमान के जल से स्नान करने से शरीर में सात्विक ऊर्जा बढ़ती है।
उन्होंने कहा —

“जब हम ठंडे पानी से स्नान करते हैं, तो मन और आत्मा दोनों शुद्ध होते हैं। यह न केवल शरीर को ताजगी देता है बल्कि भीतर की नकारात्मकता को भी दूर करता है।”

उनके अनुसार, जो व्यक्ति ब्रह्म मुहूर्त में ठंडे या सामान्य जल से स्नान करता है, उसके विचारों में सात्विकता और मन में शांति बनी रहती है। यही कारण है कि प्राचीन ऋषि-मुनि, चाहे हिमालय में हों या रेगिस्तान में, कभी गर्म पानी से स्नान नहीं करते थे।

कब और कैसे करें स्नान

प्रेमानंद महाराज ने बताया कि सर्दी के मौसम में अगर ठंडा पानी सहन नहीं हो, तो बहुत हल्का गुनगुना पानी लिया जा सकता है। उन्होंने कहा —

“पानी इतना गर्म न हो कि शरीर को झुलसा दे या त्वचा को नुकसान पहुँचाए। स्नान का तापमान हमेशा शरीर के अनुकूल और शांत होना चाहिए।”

उन्होंने यह भी कहा कि स्नान हमेशा शांत मन से, भगवान के नाम का स्मरण करते हुए करना चाहिए। इससे शरीर की शुद्धि के साथ मानसिक शुद्धि भी होती है।

वैज्ञानिक पहलू

आधुनिक चिकित्सा विज्ञान भी कुछ हद तक इस बात से सहमत है कि बहुत गर्म पानी से नहाना हानिकारक हो सकता है। डॉक्टरों के अनुसार, गर्म पानी से शरीर का तापमान अचानक बढ़ जाता है जिससे ब्लड प्रेशर में अस्थायी उतार-चढ़ाव आ सकता है। इसके अलावा, यह स्किन की नमी को खत्म कर देता है और बालों की जड़ों को कमजोर बनाता है।

निष्कर्ष

प्रेमानंद महाराज के अनुसार, स्नान सिर्फ सफाई नहीं बल्कि एक आध्यात्मिक अनुशासन है। उन्होंने कहा —

“स्नान ऐसा होना चाहिए जिससे शरीर के साथ आत्मा भी प्रसन्न हो। जितना संभव हो, ठंडे या सामान्य पानी से स्नान करें। शरीर को तपाना नहीं, ताजगी देना ही स्नान का उद्देश्य है।”

इस प्रकार, महाराज का संदेश स्पष्ट है — गर्म पानी से स्नान केवल मजबूरी में करें, आदत न बनाएं।
उनके अनुसार, जल ही जीवन है और उसी जल से जब हम शरीर को शुद्ध करते हैं, तो यह कर्म हमें ईश्वर के करीब लाता है।

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