सोशल संवाद/डेस्क: तीर्थराज प्रयागराज के संगम तट पर कल्पवास की परंपरा एक बार फिर जीवंत हो उठी है। वेद-पुराणों और शास्त्रों में वर्णित यह आध्यात्मिक साधना पौष पूर्णिमा से आरंभ होकर माघ पूर्णिमा तक चलती है। इस वर्ष कल्पवास की शुरुआत 3 जनवरी से हो चुकी है और 1 फरवरी तक श्रद्धालु त्रिवेणी संगम के पावन तट पर साधना में लीन रहेंगे। कल्पवास का उद्देश्य सांसारिक मोह-माया से विरक्त होकर आत्मशुद्धि और मोक्ष की प्राप्ति माना जाता है।

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माघ मेले के दौरान संगम क्षेत्र एक अस्थायी आध्यात्मिक नगरी का रूप ले लेता है, जहां जप-तप, यज्ञ-हवन, संतों के प्रवचन और भजन-कीर्तन की निरंतर गूंज रहती है। देश के विभिन्न प्रांतों से आए कल्पवासी यहां विचारों और संस्कृतियों का संगम रचते हैं, जो ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की भावना को साकार करता है। कठोर सर्दी के बीच कल्पवासी दिन में तीन बार स्नान, संयमित जीवन, सीमित भोजन और दान-पुण्य के माध्यम से साधना करते हैं।
शास्त्रों में कल्पवास के फल को अत्यंत दुर्लभ बताया गया है। महाभारत और पुराणों के अनुसार माघ मास में संगम तट पर एक माह का कल्पवास, दीर्घकालीन तपस्या के समान फल देने वाला माना गया है। गृहस्थ कल्पवासी पर्ण कुटियों में निवास कर संयम, अहिंसा और भक्ति के साथ जीवन व्यतीत करते हैं। मान्यता है कि कल्पवास न केवल इच्छित फल देता है, बल्कि जन्म-जन्मांतर के बंधनों से मुक्ति और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।










