सोशल संवाद/डेस्क : आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI ने हमारी जिंदगी को तेज, आसान और स्मार्ट बना दिया है। पढ़ाई हो, ऑफिस का काम, डेटा एनालिसिस, कंटेंट क्रिएशन या फिर किसी सवाल का जवाब सब कुछ अब कुछ सेकंड में संभव है। लेकिन टेक्नोलॉजी का यही बढ़ता सहारा अब मानसिक स्वास्थ्य के लिए चिंता का विषय बनता जा रहा है। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों और हालिया अध्ययनों के अनुसार, AI का अत्यधिक उपयोग खासकर AI चैटबॉट्स पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता लोगों में डिप्रेशन, एंग्जायटी और तनाव की समस्या बढ़ा सकती है।

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AI का बढ़ता असर और मानसिक सेहत
AI को भविष्य की सबसे बड़ी तकनीकी क्रांति माना जा रहा है। हेल्थ सेक्टर में भी AI की मदद से बीमारियों की पहचान, इलाज और रिसर्च में बड़ी प्रगति हुई है। लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि जब इंसान सोचने, निर्णय लेने और भावनात्मक सहारे के लिए पूरी तरह AI पर निर्भर होने लगता है, तब मानसिक संतुलन प्रभावित हो सकता है।

एक बड़े सर्वे में 21,000 से ज्यादा लोगों को शामिल किया गया, जिसमें यह पाया गया कि जो लोग रोजाना या लंबे समय तक AI टूल्स का इस्तेमाल करते हैं, उनमें डिप्रेशन के लक्षण बाकी लोगों की तुलना में ज्यादा देखे गए।
डिप्रेशन और एंग्जायटी का बढ़ता खतरा
रिसर्च के अनुसार, रोज AI इस्तेमाल करने वाले लोगों में:
- डिप्रेशन का खतरा लगभग 30% ज्यादा
- एंग्जायटी और चिड़चिड़ापन
- सोशल आइसोलेशन की भावना
- अकेलापन और भावनात्मक असंतुलन
विशेषज्ञों का कहना है कि AI चैटबॉट्स से लगातार बातचीत करने से इंसान असली रिश्तों से दूरी बनाने लगता है। इससे सोशल स्किल्स कमजोर हो सकती हैं, जो मानसिक स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक है।
AI चैटबॉट्स और भावनात्मक जुड़ाव
कई लोग अकेलापन दूर करने या अपनी भावनाएं साझा करने के लिए AI चैटबॉट्स का सहारा लेने लगे हैं। हालांकि यह तुरंत राहत देता है, लेकिन लंबे समय में यह आदत खतरनाक साबित हो सकती है।

मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि AI चैटबॉट्स क्लिनिकल ट्रेनिंग के बिना जवाब देते हैं। अगर कोई व्यक्ति बार-बार नकारात्मक सोच, डर या उदासी साझा करता है, तो चैटबॉट अनजाने में उसी सोच को मजबूत कर सकता है।
दिमागी क्षमता और रचनात्मकता पर असर
AI पर अत्यधिक निर्भरता से:
- खुद सोचने की क्षमता कम हो सकती है
- निर्णय लेने की आदत कमजोर पड़ सकती है
- रचनात्मकता और समस्या सुलझाने की स्किल्स प्रभावित हो सकती हैं

विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि जब हर छोटे-बड़े काम के लिए AI का सहारा लिया जाता है, तो दिमाग का प्राकृतिक विकास धीमा पड़ सकता है।
क्या AI ही वजह है?
हालांकि विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि यह तय करना अभी मुश्किल है कि डिप्रेशन सीधे AI की वजह से हो रहा है या पहले से मानसिक समस्या झेल रहे लोग AI का ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं। संभव है कि मानसिक तनाव से जूझ रहे लोग AI को एक सपोर्ट सिस्टम के रूप में ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हों।
संतुलन है सबसे जरूरी
AI एक शक्तिशाली टूल है, लेकिन इसका सीमित और संतुलित इस्तेमाल ही फायदेमंद है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि:
- AI को सहायक की तरह इस्तेमाल करें, विकल्प की तरह नहीं
- सोशल इंटरैक्शन को प्राथमिकता दें
- स्क्रीन टाइम और AI उपयोग की सीमा तय करें
- मानसिक परेशानी होने पर प्रोफेशनल हेल्प लें
AI हमारी जिंदगी को आसान बना सकता है, लेकिन अगर इसका इस्तेमाल समझदारी से न किया जाए, तो यह मानसिक स्वास्थ्य के लिए चुनौती बन सकता है। तकनीक के साथ इंसानी सोच, भावनाएं और रिश्ते भी उतने ही जरूरी हैं।










