सोशल संवाद/डेस्क: कुछ लोग अपनी दौलत से पहचाने जाते हैं, कुछ अपने पद से। लेकिन जहांगीर रतनजी दादाभाई टाटा (जेआरडी टाटा) उन विरले व्यक्तित्वों में थे, जिन्हें लोग उनकी इंसानियत, सादगी और लोगों के प्रति सम्मान की भावना के लिए याद करते हैं। उन्होंने सिर्फ उद्योग नहीं खड़े किए, बल्कि ऐसा नेतृत्व दिया जिसने लाखों लोगों के जीवन को छुआ और आज भी नई पीढ़ी को प्रेरित कर रहा है।

यह भी पढे :लगातार बारिश का कहर: बोलानी टाउनशिप में घर की दीवार ढही, परिवार बाल-बाल बचा
भारत के औद्योगिक विकास में जेआरडी टाटा का योगदान जितना बड़ा है, उतनी ही गहरी उनकी मानवीय सोच भी थी। वे मानते थे कि किसी भी संस्था की असली ताकत उसकी इमारतें या मशीनें नहीं, बल्कि वहां काम करने वाले लोग होते हैं। यही सोच उनके हर फैसले और व्यवहार में साफ दिखाई देती थी।
पद बड़ा था, लेकिन व्यवहार हमेशा सरल रहा
जेआरडी टाटा की सादगी के कई किस्से आज भी लोगों की जुबान पर हैं। मुंबई के स्टील हाउस में रहने वाले लोग बताते हैं कि कई बार वे खुद कार चलाकर किसी कर्मचारी या परिचित को उसके घर छोड़ने चले जाते थे। कई बार परिवार के साथ बैठकर चाय पीते, हालचाल पूछते और बच्चों के साथ खेलते भी थे। उस समय उनके सामने न कोई पद होता था और न कोई औपचारिकता, बस एक आत्मीय रिश्ता होता था।
जब चेयरमैन ने नियमों को सबसे ऊपर रखा
उनके व्यक्तित्व की सबसे चर्चित घटनाओं में से एक बॉम्बे हाउस की है। एक दिन वे लिफ्ट के सामने बाकी कर्मचारियों की तरह कतार में खड़े होकर अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। लिफ्ट ऑपरेटर ने उन्हें चेयरमैन होने के बावजूद लाइन तोड़कर आगे नहीं जाने दिया। बाद में जब उस कर्मचारी का तबादला कर दिया गया, तो जेआरडी टाटा ने खुद हस्तक्षेप किया और कहा कि जिसने नियमों का पालन किया, उसे सजा नहीं बल्कि सम्मान मिलना चाहिए। यह घटना बताती है कि उनके लिए पद से ज्यादा महत्व सिद्धांतों का था।
सफलता का श्रेय हमेशा टीम को दिया
जेआरडी टाटा कभी अपनी उपलब्धियों का ढिंढोरा नहीं पीटते थे। उनका मानना था कि कोई भी व्यक्ति अकेले सफल नहीं होता। उन्होंने एक बार कहा था कि उन्हें जो सम्मान मिला, उसके पीछे उनकी पूरी टीम का योगदान है। यही वजह थी कि उनके साथ काम करने वाले लोग उन्हें केवल एक चेयरमैन नहीं, बल्कि एक प्रेरणादायक मार्गदर्शक मानते थे।
टाटा स्टील में इंसानों को बनाया सबसे बड़ी ताकत
वर्ष 1938 से 1984 तक टाटा स्टील के चेयरमैन रहते हुए जेआरडी टाटा ने कंपनी को तकनीकी रूप से आधुनिक बनाया, लेकिन उन्होंने कभी कर्मचारियों के हितों से समझौता नहीं किया। बेहतर कार्य संस्कृति, कर्मचारियों के कल्याण, प्रबंधन और कर्मचारियों के बीच संवाद तथा सम्मानजनक माहौल उनकी प्राथमिकताओं में शामिल रहे। आज टाटा स्टील की ‘पीपल फर्स्ट’ संस्कृति उसी सोच का विस्तार मानी जाती है।
व्यवसाय के साथ समाज की जिम्मेदारी भी निभाई
जेआरडी टाटा का मानना था कि किसी उद्योग की सफलता तभी मायने रखती है, जब उसका लाभ समाज तक पहुंचे। स्वास्थ्य, शिक्षा, परिवार कल्याण और सामाजिक विकास जैसे क्षेत्रों में उनकी सोच ने जमशेदपुर को देश के सबसे बेहतर औद्योगिक शहरों में शामिल करने में अहम भूमिका निभाई।
भविष्य को देखकर लिए फैसले
जेआरडी टाटा हमेशा समय से आगे सोचते थे। भारत में नागरिक विमानन की शुरुआत हो, टाटा स्टील का आधुनिकीकरण या नई तकनीकों को अपनाने की पहल—हर कदम में उनकी दूरदर्शिता दिखाई देती थी। आज भी टाटा स्टील नवाचार, स्वच्छ तकनीक और 2045 तक नेट-जीरो कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्य की दिशा में काम कर रही है, जिसे जेआरडी टाटा की सोच का विस्तार माना जाता है।
आज भी जिंदा है उनकी विरासत
जेआरडी टाटा को दुनिया छोड़े तीन दशक से ज्यादा समय बीत चुका है, लेकिन उनके विचार आज भी टाटा स्टील की कार्य संस्कृति और मूल्यों में जीवित हैं। कर्मचारियों का सम्मान, नैतिकता, पारदर्शिता, सामाजिक जिम्मेदारी और उत्कृष्टता की संस्कृति आज भी कंपनी की पहचान बनी हुई है। जेआरडी टाटा ने सिर्फ एक सफल उद्योग समूह नहीं बनाया, बल्कि यह सिखाया कि सच्चा नेतृत्व वही है, जो लोगों का विश्वास जीतता है, उनके जीवन को बेहतर बनाता है और समाज के लिए सकारात्मक बदलाव की मिसाल बनता है। यही वजह है कि वे आज भी सिर्फ एक उद्योगपति नहीं, बल्कि हर दिल में बसने वाले एक प्रेरणादायक व्यक्तित्व के रूप में याद किए जाते हैं।









