सोशल संवाद / डेस्क : टाटा स्टील में हालिया वेतन पुनरीक्षण के बाद बंचिंग और डी-बंचिंग के नियम को लेकर कर्मचारियों के बीच चर्चा तेज हो गई है। फील्ड मेंटेनेंस मैकेनिकल विभाग के कमेटी मेंबर शैलेंद्र कुमार ने इस व्यवस्था की समीक्षा की मांग करते हुए टाटा वर्कर्स यूनियन के अध्यक्ष को एक ज्ञापन सौंपा है।

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शैलेंद्र कुमार के अध्ययन के मुताबिक, मौजूदा व्यवस्था में समान ग्रेड के कर्मचारियों को डी-बंचिंग का लाभ उनके पुराने इंक्रीमेंट की तारीख के आधार पर अलग-अलग मिल रहा है। इससे कुछ कर्मचारियों को अपेक्षाकृत ज्यादा और कुछ को काफी कम आर्थिक लाभ मिलने की स्थिति बन रही है।
उन्होंने एनएस-7 ग्रेड का उदाहरण देते हुए बताया कि पुराने वेतनमान में 710 रुपये के अंतर वाले दो स्टेप संशोधित वेतनमान में एक ही इंक्रीमेंट स्टेप पर आ गए। नए और पुराने इंक्रीमेंट के बीच 340 रुपये का अंतर होने के कारण डी-बंचिंग में कर्मचारियों को यह राशि अलग-अलग अनुपात में मिलती है।
रिपोर्ट के अनुसार, जनवरी में पुराने स्टेप पर पहुंचने वाले कर्मचारी के मामले में अंतर का पूरा 340 रुपये तक का लाभ बनता है, जबकि दिसंबर में उसी स्थिति में पहुंचने वाले कर्मचारी को करीब 28.33 रुपये का अंतर मिलता है। यही असमानता अब सवालों के घेरे में है।
कमेटी मेंबर का कहना है कि डी-बंचिंग की व्यवस्था मूल रूप से वरिष्ठ कर्मचारियों के वेतन हितों की रक्षा के लिए बनाई गई थी। लेकिन मौजूदा वेतन संरचना में बदलाव के बाद इसके परिणाम अलग दिखाई दे रहे हैं। उनका तर्क है कि यदि बंचिंग नए इंक्रीमेंट डिजाइन का गणितीय परिणाम है, तो डी-बंचिंग के कारण किसी कर्मचारी को आर्थिक नुकसान नहीं होना चाहिए।
उन्होंने यूनियन से मांग की है कि मौजूदा डी-बंचिंग नियम की दोबारा समीक्षा कर इसे वर्तमान वेतन संरचना के अनुरूप अधिक तर्कसंगत और समानतापूर्ण बनाया जाए। अब कर्मचारियों की नजर यूनियन और प्रबंधन की ओर है कि इस मुद्दे पर क्या निर्णय लिया जाता है।









