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CEC Gyanesh Kumar Removal: मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की क्या है प्रक्रिया?

By Tamishree Mukherjee

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CEC Gyanesh Kumar Removal
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सोशल संवाद / नई दिल्ली: भारत निर्वाचन आयोग (ECI) में कथित आंतरिक मतभेदों को लेकर सामने आई एक रिपोर्ट के बाद राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में आयोग के कुछ फैसलों और कामकाज को लेकर कम से कम 14 बार लिखित आपत्ति दर्ज की। इन आपत्तियों का संबंध मतदाता सूची में नाम जोड़ने-हटाने, वोटर डेटा तक पहुंच और Special Intensive Revision (SIR) से जुड़े फैसलों से बताया गया है।

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इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार पर सवाल उठाए हैं। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने भी चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी है। वहीं, चुनाव आयोग के सूत्रों ने आंतरिक मतभेद की रिपोर्ट को खारिज करते हुए कहा है कि SIR समेत आयोग के सभी फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से लिए गए।

इस बीच CEC को हटाने के लिए संसद में प्रस्ताव लाने की चर्चा भी तेज हो गई है। ऐसे में सवाल है कि भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया क्या है और संसद की इसमें क्या भूमिका होती है?

चुनाव आयोग में कितने सदस्य होते हैं?

संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग को देश में चुनावों के संचालन और मतदाता सूची की तैयारी की निगरानी की जिम्मेदारी दी गई है। आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और अन्य चुनाव आयुक्त होते हैं।

मौजूदा व्यवस्था में तीन सदस्यीय आयोग है। CEC आयोग के अध्यक्ष होते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हर फैसला अकेले CEC लेते हैं।

2023 के कानून के मुताबिक आयोग का कामकाज, जहां तक संभव हो, सर्वसम्मति से किया जाना चाहिए। अगर आयुक्तों के बीच किसी मुद्दे पर मतभेद हो, तो फैसला बहुमत के आधार पर किया जा सकता है।

चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति कैसे होती है?

Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners (Appointment, Conditions of Service and Term of Office) Act, 2023 के तहत CEC और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं। नियुक्ति के लिए चयन समिति की सिफारिश होती है।

चुनाव आयुक्तों का कार्यकाल अधिकतम 6 साल या 65 वर्ष की आयु, जो पहले हो, तक हो सकता है। 2023 के कानून के तहत CEC और चुनाव आयुक्तों को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के बराबर वेतन दिया जाता है।

मुख्य चुनाव आयुक्त को कैसे हटाया जा सकता है?

मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया आम संवैधानिक पदों की तुलना में काफी सख्त है। संविधान के अनुच्छेद 324(5) के मुताबिक CEC को उसी तरीके और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिस तरीके और आधार पर सुप्रीम कोर्ट के किसी न्यायाधीश को हटाया जाता है। 2023 के कानून की धारा 11(2) में भी यही प्रावधान दोहराया गया है।

यानी केवल राजनीतिक असहमति या किसी फैसले को लेकर विवाद CEC को हटाने के लिए पर्याप्त नहीं है। हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया के लिए सिद्ध कदाचार (proved misbehaviour) या अक्षमता (incapacity) जैसे आधार जरूरी होते हैं।

संसद में क्या होती है प्रक्रिया?

CEC को हटाने की प्रक्रिया संसद से जुड़ी होती है। इसकी शुरुआत किसी एक सदन में प्रस्ताव के नोटिस से हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया के अनुरूप, प्रस्ताव को आगे बढ़ाने के लिए संबंधित सदन में निर्धारित संख्या में सांसदों का समर्थन जरूरी होता है।

प्रस्ताव स्वीकार होने के बाद आरोपों की जांच के लिए निर्धारित प्रक्रिया अपनाई जाती है। यदि जांच के बाद मामला आगे बढ़ता है तो हटाने का प्रस्ताव संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत से पारित होना जरूरी होता है।

यानी सिर्फ एक सदन में प्रस्ताव पास होना पर्याप्त नहीं है। दोनों सदनों की संवैधानिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही CEC को हटाने की कार्रवाई आगे बढ़ सकती है।

क्या दूसरे चुनाव आयुक्तों को भी इसी तरह हटाया जाता है?

CEC और अन्य चुनाव आयुक्तों की सुरक्षा व्यवस्था में अंतर है। 2023 के कानून की धारा 11 के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के समान प्रक्रिया से हटाया जा सकता है, जबकि किसी अन्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए CEC की सिफारिश जरूरी होती है। इसलिए CEC का पद संवैधानिक रूप से विशेष सुरक्षा वाला पद माना जाता है।

14 लिखित आपत्तियों को लेकर क्या सामने आया?

The Indian Express की रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने करीब 10 महीनों में कम से कम 14 बार आयोग के कुछ फैसलों पर लिखित आपत्ति दर्ज की।

रिपोर्ट में जिन मुद्दों का उल्लेख किया गया है, उनमें नए मतदाताओं के लिए Form-6 में बदलाव, मतदाता सूची के डिजिटल डेटाबेस तक पहुंच का केंद्रीकरण, पश्चिम बंगाल में मतदाता अपीलों और गोवा में मतदाता सूची से जुड़े सॉफ्टवेयर संबंधी मुद्दे शामिल हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक दोनों आयुक्तों ने कुछ मामलों में इस बात पर भी सवाल उठाए कि क्या कुछ फैसले उनकी जानकारी या मंजूरी के बिना लिए गए।

हालांकि, चुनाव आयोग के सूत्रों ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा कि SIR सहित आयोग के फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से लिए गए थे।

SIR को लेकर क्यों बढ़ा विवाद?

मतदाता सूची के Special Intensive Revision (SIR) को लेकर पहले से ही राजनीतिक विवाद चल रहा है। इस प्रक्रिया में मतदाता सूची को दोबारा सत्यापित किया जा रहा है और पात्र मतदाताओं के नाम सुनिश्चित करने के साथ अपात्र, मृत, स्थानांतरित या डुप्लीकेट नामों की पहचान की जा रही है।

पश्चिम बंगाल में SIR के दौरान हटाए गए मतदाताओं को लेकर मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। चुनाव आयोग ने अदालत को बताया कि हटाए गए करीब 27.16 लाख मतदाताओं में से 22 लाख से ज्यादा ने नाम बहाल कराने के लिए अपील की है। यही वजह है कि मतदाता सूची के डेटा, नाम जोड़ने-हटाने और SIR की प्रक्रिया को लेकर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर राजनीतिक और कानूनी बहस जारी है।

CEC को हटाना आसान क्यों नहीं है?

CEC का कार्यकाल और पद की सुरक्षा इस तरह तय की गई है कि चुनाव आयोग राजनीतिक दबाव से स्वतंत्र होकर काम कर सके।

संविधान सीधे तौर पर CEC को हटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के समान प्रक्रिया निर्धारित करता है। इसके अलावा 2023 के कानून में भी CEC की सुरक्षा को बरकरार रखा गया है। इसलिए किसी रिपोर्ट, राजनीतिक आरोप या संसद में दिए गए बयान के आधार पर CEC तत्काल पद से नहीं हटते। इसके लिए संवैधानिक प्रक्रिया और आवश्यक संसदीय बहुमत पूरा करना होता है।

अब आगे क्या?

चुनाव आयोग में कथित मतभेदों और SIR को लेकर राजनीतिक बहस आने वाले दिनों में और बढ़ सकती है। एक तरफ विपक्ष आयोग की कार्यप्रणाली और CEC की भूमिका पर सवाल उठा रहा है, वहीं चुनाव आयोग ने सभी फैसलों में तीनों आयुक्तों की मंजूरी होने की बात कही है।

इस पूरे विवाद में अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि सामने आई आपत्तियों पर आगे कोई औपचारिक कार्रवाई होती है या नहीं और संसद में CEC को हटाने की प्रक्रिया किस स्तर तक पहुंचती है।

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