सोशल संवाद/डेस्क : सुप्रीम कोर्ट ने यूपीआई भुगतान पर अगले महीने से प्रस्तावित एमडीआर शुल्क से राहत देने से इनकार किया। अदालत ने केंद्र से बताने को कहा कि यूपीआई भुगतान पर शुल्क लगाने का फैसला क्यों लिया गया, इसका आधार क्या हैं। शुल्क लगाने के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर शीर्ष अदालत ने केंद्र से यह जवाब मांगा है।
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मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने केंद्र सरकार को हलफनामा दाखिल करने का आदेश दिया है। पीठ ने याचिका पर विचार करते हुए केंद्र सरकार, भारतीय रिजर्व बैंक, एनपीसीआई को नोटिस जारी किया है। सुनवाई की शुरुआत में केंद्र की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एन. वेंकटरमन ने पीठ से कहा कि 96 फीसदी भुगतान पर यह शुल्क नहीं लगेगा और जरूरी सेवाओं के लिए शुल्क की अधिकतम सीमा पांच रुपये तय की गई है।
उन्होंने पीठ से कहा कि यह न तो टैक्स है और न ही फीस। इस पर सीजेआई ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल वेंकटरमन से कहा कि आप जो कह रहे हैं, हमें ये तथ्य हलफनामे में चाहिए। जस्टिस बागची ने भी सवाल किया कि यदि यह फीस नहीं है, तो इस वसूली का कार्यकारी आधार क्या है, इसमें कौन सी सर्विस दी जा रही है।
सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता अंजन दत्ता ने याचिका में कहा है कि यह शुल्क बिना किसी उचित कानूनी सुरक्षा, पारदर्शिता या सार्वजनिक सलाह-मशविरे के लागू किया गया है।
सरकार को एक भी पैसा नहीं मिलेगा
केंद्र की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एन. वेंकटरमन ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि यह कोई जबरदस्ती वसूली नहीं है और इस शुल्क से भारत सरकार एक रुपया नहीं ले रही है। यह पेमेंट एग्रीगेटर और बैंकों के बीच एक सेटलमेंट शुल्क है। उन्होंने शीर्ष अदालत को बताया कि जब बैंक इलेक्ट्रॉनिक ट्रांजैक्शन करते हैं तो उसमें लागत आती है और क्रेडिट/डेबिट कार्ड ट्रांजैक्शन पर शुल्क लगते हैं, जबकि यूपीआई पेमेंट को इन शुल्कों से छूट दी गई थी।











