सोशल संवाद / रांची : झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएससी) से जुड़ी तीन महत्वपूर्ण नियुक्ति रद्द करने के सरकार के आदेश के खिलाफ शुक्रवार को झारखंड हाईकोर्ट में सुनवाई शुरू हुई। प्रार्थी और राज्य सरकार अपना-अपना पक्ष रख रहे हैं। जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने मामले की अगली सुनवाई की तिथि 12 अक्तूबर निर्धारित की है। कोर्ट में 11वीं-13वीं संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा, बाल विकास परियोजना पदाधिकारी (सीडीपीओ) और फूड सेफ्टी ऑफिसर की नियुक्तियां रद्द करने को चुनौती दी गयी है।
यह भी पढे : बिहार की ट्रेनें फुल, टाटा-बक्सर पूजा स्पेशल 13 अक्तूबर से चलेगी
प्रार्थियों की ओर से अधिवक्ता अमृतांश वत्स और अधिवक्ता इंद्रजीत सिन्हा ने पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि सरकार ने तीनों परीक्षाओं को टीडीपीएल (टीडीपीएल) से जोड़ते हुए नियुक्तियां रद्द की हैं, जबकि जुलाई 2025 में टीडीपीएल की परीक्षा प्रक्रिया से से जुड़ने तक चयन प्रक्रिया लगभग पूरी हो चुकी थी। उस समय चयनित अभ्यर्थियों के दस्तावेजों का सत्यापन चल रहा था। इन तीनों परीक्षाओं के संबंध में न तो कोई प्राथमिकी दर्ज की गई है, न किसी अभ्यर्थी को समन किया गया है और न ही किसी की गिरफ्तारी हुई है। सफल अभ्यर्थियों के खिलाफ परीक्षा में पैसे के लेनदेन से संबंधित कोई मनी ट्रेल भी सामने नहीं आई है। ऐसे में सभी नियुक्तियों को रद्द करने का फैसला उचित नहीं है।
प्रार्थियों का तर्क- ठोस साक्ष्य के बिना कार्रवाई: प्रार्थियों की ओर से कहा गया कि इन तीनों परीक्षाओं में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी के ठोस साक्ष्य सामने नहीं आए हैं। उनके अनुसार, सीआईडी जांच में भी इन परीक्षाओं में अनियमितता के प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं मिले हैं।
प्रार्थियों की ओर से कहा गया कि केवल टीडीपीएल की संभावित संलिप्तता की आशंका के आधार पर नियुक्तियां रद्द करना उचित नहीं है। अधिवक्ताओं ने आरोप लगाया कि सरकार ने जल्दबाजी और राजनीतिक दबाव में यह निर्णय लिया है।
नियुक्तियां रद्द करने के अधिकार पर भी सवालः अधिवक्ता अमृतांश वत्स ने सरकार के फैसले की वैधानिकता पर सवाल
उठाते हुए कहा कि तीनों परीक्षाओं की नियुक्तियां रद्द करने संबंधी अधिसूचना असंवैधानिक है। उन्होंने दलील दी कि परीक्षा और विज्ञापन रद्द करने का अधिकार संबंधित लोक सेवा आयोग के पास है। राज्य सरकार को नियुक्ति आदेश रद्द करने का अधिकार हो सकता है, लेकिन इसके लिए भी संविधान और कानून के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना जरूरी है।
सरकार का दावा- निष्पक्षता प्रभावित के संकेत मिले
सरकार ने परीक्षा में सुनियोजित अनियमितता होने का दावा करते हुए अपने निर्णय का बचाव किया। सरकार का कहना था कि जांच में परीक्षा की निष्पक्षता प्रभावित होने के संकेत मिले हैं और सफल अभ्यर्थियों में दोषियों तथा निर्दोषों की पहचान करना मुश्किल है। सरकार के अनुसार, परीक्षा की शुचिता भंग हुई है और अनियमितता व्यवस्थित तरीके से की गई है।
बड़े पैमाने पर अनियमितता
राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि सीआईडी की जांच और उससे जुड़े दस्तावेजों से परीक्षा एवं नियुक्ति प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर अनियमितता के संकेत मिले हैं। सरकार ने दलील दी कि परीक्षा की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े होने की स्थिति में नियुक्तियां रद्द करने का निर्णय लेना उसके अधिकार क्षेत्र में है।
सरकार का पक्ष :
- जांच में परीक्षा की निष्पक्षता प्रभावित होने के संकेत मिले
- राज्य सरकार को विज्ञापन रद्द करने का है पूरा अधिकार
प्रार्थियों ने कहा
- सिविल सेवा, सीडीपीओ और एफएसओ में गड़बड़ी नहीं
- सीआईडी ने इन परीक्षाओं में एक को भी नहीं किया समन
- सरकार नियुक्ति रद्द कर सकती है, परीक्षा और विज्ञापन नहीं
- परीक्षा और विज्ञापन रद्द करने का अधिकार जेपीएससी को











