AI Data Centers: भारत में पानी का संकट बढ़ा सकता है AI, NITI Aayog ने जारी किया नया फ्रेमवर्क

By Riya Kumari

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AI Data Centers: भारत में पानी का संकट बढ़ा सकता है AI, NITI Aayog ने जारी किया नया फ्रेमवर्क

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सोशल संवाद / डेस्क : आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। इसके साथ ही देश में डेटा सेंटरों की जरूरत भी बढ़ रही है। हालांकि, इन डेटा सेंटरों को चलाने के लिए बड़ी मात्रा में बिजली, पानी और बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर की आवश्यकता होती है। ऐसे में पानी की कमी वाले क्षेत्रों में डेटा सेंटरों का विस्तार जल संकट को और गंभीर बना सकता है।

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इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए नीति आयोग (NITI Aayog) के फ्रंटियर टेक हब ने 14 अक्टूबर 2026 को Data Centre Evaluation Framework जारी किया है। इसका उद्देश्य राज्यों को डेटा सेंटर परियोजनाओं का आकलन करने, प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और निवेश से मिलने वाले दीर्घकालिक आर्थिक लाभ को समझने में मदद करना है।

भारत में तेजी से बढ़ रही डेटा सेंटरों की क्षमता

भारत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्लाउड कंप्यूटिंग और डिजिटल सेवाओं के बढ़ते इस्तेमाल के कारण डेटा सेंटर उद्योग का विस्तार हो रहा है। नीति आयोग के अनुसार, देश में डेटा सेंटरों की क्षमता 2020 में लगभग 375 मेगावाट से बढ़कर अक्टूबर 2026 तक करीब 1.5 गीगावाट हो गई है।

डेटा सेंटर डिजिटल सेवाओं को संचालित करने के लिए महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इनके संचालन में बिजली और कूलिंग सिस्टम की बड़ी भूमिका होती है। कई कूलिंग प्रणालियों में पानी का इस्तेमाल किया जाता है। ऐसे में इन परियोजनाओं की योजना बनाते समय स्थानीय जल उपलब्धता और पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन करना जरूरी है।

पानी की कमी वाले क्षेत्रों में बढ़ सकती है चुनौती

वर्ल्ड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट (WRI) इंडिया के मई 2026 में प्रकाशित विश्लेषण के अनुसार, भारत के आधे से अधिक डेटा सेंटर जल संकट के जोखिम वाले क्षेत्रों में स्थित हैं। देश के लगभग 75 प्रतिशत डेटा सेंटर महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक, तेलंगाना और उत्तर प्रदेश में केंद्रित हैं।

इनमें से कई क्षेत्र पहले से ही पानी की उपलब्धता से जुड़ी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। ऐसे इलाकों में नए डेटा सेंटर स्थापित करने से पहले यह देखना जरूरी है कि परियोजना की पानी की मांग का स्थानीय लोगों, कृषि और अन्य उद्योगों की जरूरतों पर क्या असर पड़ेगा।

NITI Aayog के फ्रेमवर्क में पानी की उपलब्धता पर जोर

नीति आयोग के नए फ्रेमवर्क में डेटा सेंटर परियोजनाओं का आकलन करने के लिए पांच प्रमुख पहलुओं को शामिल किया गया है:

  • बिजली और ऊर्जा की उपलब्धता
  • पानी और कूलिंग व्यवस्था
  • स्थान चयन और पर्यावरणीय स्थिरता
  • आर्थिक एवं रणनीतिक लाभ
  • नीतियां, प्रशासन और क्रियान्वयन

फ्रेमवर्क के अनुसार, राज्यों को किसी परियोजना को मंजूरी देने से पहले बिजली, पानी, जमीन और अन्य जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर की उपलब्धता का आकलन करना चाहिए। इसका उद्देश्य केवल निवेश आकर्षित करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि परियोजना लंबे समय तक टिकाऊ तरीके से संचालित हो सके।

बारिश के पानी और ट्रीटेड वॉटर के इस्तेमाल की सिफारिश

जल संसाधनों पर दबाव कम करने के लिए फ्रेमवर्क में वर्षा जल संचयन, परिसर में पानी के उपचार और भंडारण की व्यवस्था पर जोर दिया गया है। राज्यों को जलग्रहण क्षेत्र में पानी की उपलब्धता, भूजल, सतही जल, नगर निकायों की आपूर्ति और घरेलू तथा कृषि जरूरतों का आकलन करने की सलाह दी गई है।

जहां पानी की कमी गंभीर हो, वहां परियोजनाओं को मौजूदा मीठे पानी के स्रोतों पर अतिरिक्त दबाव डालने से बचना चाहिए। इसके लिए उपचारित अपशिष्ट जल और पानी की खपत कम करने वाली आधुनिक कूलिंग तकनीकों के विकल्पों पर विचार करने की सिफारिश की गई है।

निवेश के साथ पर्यावरणीय जिम्मेदारी भी जरूरी

नए फ्रेमवर्क में राज्यों को डेटा सेंटर परियोजनाओं से मिलने वाले वास्तविक आर्थिक लाभ का आकलन करने की भी सलाह दी गई है। इसमें रोजगार, स्थानीय खरीद, कौशल विकास, घरेलू तकनीकी उत्पादन और नवीकरणीय ऊर्जा के इस्तेमाल जैसे पहलुओं को शामिल किया गया है।

इसके अलावा, परियोजनाओं के लिए सरकारी प्रोत्साहन को मापने योग्य परिणामों से जोड़ने और निर्धारित लक्ष्यों की निगरानी करने पर जोर दिया गया है। इससे राज्यों को यह तय करने में मदद मिल सकती है कि किसी परियोजना से मिलने वाला लाभ सरकारी सहायता और संसाधनों पर पड़ने वाले दबाव के मुकाबले कितना है।

AI की तरक्की के साथ जल सुरक्षा भी जरूरी

भारत में AI और डिजिटल सेवाओं का विस्तार अर्थव्यवस्था के लिए नए अवसर पैदा कर रहा है। लेकिन इस विकास को टिकाऊ बनाने के लिए डेटा सेंटरों की बिजली और पानी की जरूरतों का सही आकलन करना आवश्यक है।

NITI Aayog का नया फ्रेमवर्क राज्यों को निवेश संबंधी फैसले लेते समय इंफ्रास्ट्रक्चर, पर्यावरण और आर्थिक लाभ के बीच संतुलन बनाने में मदद करने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। इसके प्रभावी इस्तेमाल से डेटा सेंटरों के विस्तार और स्थानीय जल संसाधनों की सुरक्षा के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करने की दिशा में मदद मिल सकती है।

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