सोशल संवाद/डेस्क: झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री चम्पाई सोरेन आज रामगढ़ जिले के घाटो से लेकर बोकारो तक तूफानी दौरे पर रहे। इस दौरान उन्होंने विभिन्न गांवों के विस्थापितों से मिल कर, उनकी समस्याएं सुनीं, तथा उनके हक एवं अधिकार की लड़ाई को मुकाम तक पहुंचाने का वादा किया।
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सुबह करीब 11 बजे, पूर्व सीएम रामगढ़ के घाटो पहुंचे, जहां उन्होंने सारूबेड़ा जाहेरस्थान में पूजा कर, झारखंड के मजदूरों, किसानों एवं विस्थापितों की लड़ाई को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया। इस दौरान स्थानीय विस्थापितों एवं ग्रामीणों द्वारा उनका जोरदार स्वागत किया गया।
उसके बाद चम्पाई सोरेन चार नंबर मोड़ पहुंचे, जहां उन्होंने टाटा स्टील एवं सीसीएल के विस्थापितों की समस्याएं सुनीं, एवं उनके हक एवं अधिकार की लड़ाई में हर संभव सहयोग देने का वादा किया। नब्बे के दशक में टाटा स्टील के ठेका मजदूरों के स्थायीकरण के लिए चलाए गए अपने आंदोलन की सफलता का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि उस दौरान हजारों आदिवासी/ मूलवासी मजदूरों को परमानेंट नौकरी मिली थी।
तत्पश्चात पूर्व मुख्यमंत्री बोकारो जिले के ललपनिया स्थित आदिवासी आस्था के महत्वपूर्ण केंद्र लुगुबुरु घांटाबाड़ी धोरोम गाढ़ पहुंचे, जहाँ उन्होंने पूजा अर्चना कर प्रदेशवासियों की सुख शांति एवं समृद्धि की कामना की। वहां उन्होंने विस्थापितों को लेकर लुगू बाबा से आशीर्वाद मांगा।
दोपहर में, बोकारो पहुंचने के क्रम में, बालीडीह टॉल ब्रिज, एल एच मोड़, बिरसा चौक समेत कई स्थानों पर स्थानीय ग्रामीणों एवं विस्थापितों ने गर्मजोशी से उनका स्वागत किया। बिरसा चौक पर भगवान बिरसा मुंडा को श्रद्धा सुमन अर्पित करने के बाद, पूर्व सीएम ने मीडिया के सामने विस्थापितों की लड़ाई लड़ने का ब्लूप्रिंट रखा। उन्होंने कहा कि यह लड़ाई विस्थापितों द्वारा ही लड़ी जायेगी, तथा हर वह व्यक्ति अथवा नेता इससे जुड़ सकता है, जिसके मन में विस्थापितों के प्रति दर्द हो।
उन्होंने कहा कि कंपनी प्रबंधन तथा सरकार के पास डेढ़ माह का समय है, इस दौरान अगर वे अप्रेंटिस किए युवाओं को नौकरी समेत विस्थापितों के सभी मुद्दों का समाधान कर देते हैं, तो इस आन्दोलन की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। लेकिन अगर इस अवधि में ऐसा नहीं होता है, तो फिर एक ऐसा जन आंदोलन खड़ा होगा, जिसे आने वाली पीढ़ियाँ याद रखेंगी।
पूर्वी सिंहभूम जिले के जादूगोड़ा स्थित यूरेनियम कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (UCIL) के मामले का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि पहले वहां कम से कम चार एकड़ जमीन देने वालों को ही नौकरी मिलने का प्रावधान था, लेकिन नब्बे के दशक में हुए उनके आंदोलन के बाद, प्रबंधन उस नियम को बदलने पर मजबूर हो गया। उसके बाद पांच डिसमिल जमीन देने वाले लोगों को भी नौकरी मिलने लगी, जिसका लाभ हजारों विस्थापितों को मिला।
इसके साथ ही, उन्होंने अपने विधानसभा क्षेत्र के तहत ईचा खरकाई डैम का उदाहरण देते हुए बताया कि उनके आंदोलन की वजह से वहां शिलान्यास तक नहीं हो पाया, जिसकी वजह से 86 गांव डूबने से बच गये। उन्होंने कहा कि शिलान्यास के समय स्थिति काफी तनावपूर्ण हो गई थी, लेकिन प्रभावित ग्रामीण पीछे नहीं हटे, जिसके फलस्वरूप वे विस्थापित होने से बच गए।
उसके बाद, पूर्व मुख्यमंत्री चम्पाई सोरेन मोदीडीह गांव पहुंचे जहां बड़ी संख्या में जुटे विस्थापितों ने उन्हें अपनी समस्याएं बताईं। उन्होंने बताया कि उनके गांवों का अस्तित्व खत्म करने की साजिश चल रही है, जन्म/मृत्यु प्रमाण पत्र जैसे आवेदन करते समय भी, ऑनलाइन फॉर्मों से उनके गांवों का नाम हटा दिया गया है, जिसकी वजह से काफी दिक्कत होती है। उन्होंने प्रदूषण से हो रही दिक्कतों, कंपनी प्रबंधन की मनमानी तथा उनके झूठे वायदों का भी जिक्र किया।
कार्यक्रम के अंतिम चरण में, पूर्व सीएम दिवंगत प्रेम प्रसाद महतो के गांव शिबूटांड़ गांव पहुंचे, जहां उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि मुझे ऐसा लगता है मानो दिवंगत आंदोलनकारी प्रेम महतो की आत्मा ने उन्हें इस आंदोलन से जुड़ने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि पहले उनका कार्यक्षेत्र कोल्हान के आसपास सीमित था, और अन्य नेता इस क्षेत्र की देखते थे, लेकिन यह दुखद है कि इस क्षेत्र से कई बड़े-बड़े नेता पैदा हुए, लेकिन विस्थापितों की हालत जस के तस है।
इसी गांव में, उन्होंने एक हल-बैल को चलाकर अपने इरादों को जाहिर कर दिया। उन्होंने कहा कि अगर डेढ़ महीने में विस्थापितों की समस्याओं का समाधान नहीं होगा, तो राज्य भर के विभिन्न योजनाओं के विस्थापित बोकारो आकर, यहां खाली पड़ी जमीन पर हल चलाएंगे।









