Responsive Full Width Slider
Advertisement 1
Advertisement 2

मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा द्वारा 2 वर्षों में डूंगरपुर-बांसवाड़ा के 12-13 दौरे हुये हे, उनके द्वारा यहाँ जुमलेबाजी के अलावा कोई विशेष सौगात नहीं दी – सांसद राजकुमार रोत

By Tamishree Mukherjee

Published :

Follow
Srinath Advertisement
Dayal Advertisement

Join WhatsApp

Join Now

सोशल संवाद / डेस्क : बांसवाड़ा–डूंगरपुर सांसद राजकुमार रोत ने 16 मार्च को बेणेश्वर धाम में आयोजित होने वाले मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के कार्यक्रम से पहले राज्य सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा लगातार आदिवासी क्षेत्र का दौरा कर रहे हैं, लेकिन इन दौरों से क्षेत्र को कोई ठोस सौगात नहीं मिली है।

यह भी पढ़े : नरेला जोन के निरीक्षण पर पहुंचीं सत्या शर्मा, स्वास्थ्य व शिक्षा ढांचे को मजबूत करने के दिए निर्देश

Sunrise Enclave
ASL Motors and Dilip Kia

रोत ने कहा कि मुख्यमंत्री बनने के बाद से अब तक भजनलाल शर्मा ने बांसवाड़ा और डूंगरपुर जिलों में लगभग 12 से 13 दौरे किए हैं। बांसवाड़ा में तलवाड़ा में आयोजित विकास भारत संकल्प यात्रा शिविर, बांसवाड़ा में जनजाति गौरव दिवस कार्यक्रम, 2 अगस्त को पीएम किसान सम्मान निधि कार्यक्रम, 20 सितंबर और 24 सितंबर के आसपास आयोजित कार्यक्रमों सहित कई सभाएं हुईं। वहीं डूंगरपुर जिले में भी मुख्यमंत्री सागवाड़ा, कुआं क्षेत्र, आसपुर के जामूखंड तथा बेणेश्वर धाम सहित कई कार्यक्रमों में शामिल हुए और 15 नवंबर 2025 को राष्ट्रीय जनजाति गौरव दिवस कार्यक्रम में भी आए।

उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री का बार-बार आना अच्छी बात है, लेकिन यह जानना जरूरी है कि इन दौरों से क्षेत्र को क्या मिला। उनका कहना है कि इन कार्यक्रमों पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए, लेकिन क्षेत्र के लिए कोई बड़ी घोषणा या ठोस विकास कार्य सामने नहीं आया। रोत के अनुसार इन 12–13 दौरों के दौरान कार्यक्रमों और व्यवस्थाओं पर लगभग 20 से 25 करोड़ रुपये तक खर्च किए गए, लेकिन क्षेत्र की मूल समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि इन कार्यक्रमों में प्रशासनिक अधिकारियों, कर्मचारियों, पटवारियों, शिक्षकों और अन्य विभागों के कर्मचारियों को भीड़ जुटाने के लिए लगाया जाता है, जबकि जनता के सामने सिर्फ पुरानी सरकारी योजनाओं का प्रचार किया जाता है और विकास के नाम पर केवल दिखावा किया जाता है।

सांसद रोत ने कहा कि बेणेश्वर धाम को आदिवासियों का महाकुंभ कहा जाता है और सरकार भी वहां जनजाति गौरव दिवस मना रही है, लेकिन वास्तविकता यह है कि वहां आदिवासी समाज के लिए कोई पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। उन्होंने कहा कि आदिवासी श्रद्धालुओं को आज भी नदियों के किनारे झाड़ियों के बीच खाना बनाकर प्रसादी ग्रहण करनी पड़ती है और महिलाओं को खुले में स्नान करना पड़ता है। रोत ने कहा कि अन्य समाजों के भवन वहां बने हुए हैं, जो अच्छी बात है, लेकिन जिस स्थान को आदिवासियों का महाकुंभ कहा जाता है वहां आदिवासी समाज के लिए जमीन तक आरक्षित नहीं है।

उन्होंने मांग की कि बेणेश्वर धाम क्षेत्र की कम से कम 80 प्रतिशत जमीन आदिवासी समाज के लिए आरक्षित की जाए और वहां सामुदायिक भवन, शौचालय और अन्य मूलभूत सुविधाएं विकसित की जाएं। उन्होंने यह भी कहा कि आदिवासी समाज ने चंदा इकट्ठा कर लगभग 8 लाख रुपये से एक जमीन समतल करवाई थी ताकि वहां आदिवासी समाज के लोग कार्यक्रम कर सकें और ठहर सकें, लेकिन बाद में उसी जमीन पर राष्ट्रपति के दौरे के नाम पर हेलिपैड बना दिया गया और जब आदिवासी संगठनों ने इसका विरोध किया तो उन्हें पाबंद किया गया और मुकदमे दर्ज किए गए।

रोत ने बेणेश्वर धाम से जुड़े ट्रस्ट और प्राधिकरण पर भी गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि जिस स्थान को आदिवासियों का महाकुंभ कहा जाता है वहां बने ट्रस्टों में एक भी आदिवासी सदस्य शामिल नहीं है। उन्होंने बताया कि नीलकंठ भगवान प्रन्यास हरी मंदिर साबला ट्रस्ट में अध्यक्ष के रूप में बलवंत सिंह चौहान तथा सदस्य के रूप में परमेश्वर नागर, सुरेश शर्मा, चंद्रकांत शुक्ला, गुमान सिंह चौहान, जयंतीलाल व्यास और मानसिंह राठौड़ शामिल हैं, लेकिन इनमें एक भी आदिवासी प्रतिनिधि नहीं है। इसी प्रकार राजस्थान देवस्थान विभाग द्वारा बनाए गए बेणेश्वर धाम विकास बोर्ड में भी प्रशासनिक अधिकारियों को शामिल किया गया है, लेकिन आदिवासी समाज को प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया। उन्होंने इसे आदिवासी समाज के साथ सौतेला व्यवहार बताते हुए कहा कि जिस आस्था स्थल को आदिवासियों का महाकुंभ कहा जाता है वहां निर्णय लेने वाली संस्थाओं में आदिवासी समाज की भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए।

सांसद रोत ने बेणेश्वर मेले में अवैध वसूली और भ्रष्टाचार का आरोप भी लगाया। उन्होंने कहा कि मेले के दौरान हरि मंदिर के आसपास करीब 180 दुकानें लगाई जाती हैं और दुकानदारों से 20 हजार से लेकर 35 हजार रुपये तक वसूले जाते हैं, लेकिन उन्हें किसी प्रकार की आधिकारिक रसीद नहीं दी जाती। उन्होंने कहा कि यह पैसा कौन ले रहा है इसका कोई स्पष्ट रिकॉर्ड नहीं है और जानकारी मिलने पर सामने आया कि ट्रस्ट से जुड़े लोग यह वसूली कर रहे हैं। रोत ने आरोप लगाया कि हर साल मेले के नाम पर करीब डेढ़ करोड़ रुपये तक की अवैध वसूली होती है और प्रशासन इस पर आंख मूंदे बैठा रहता है, जबकि छोटे व्यापारियों पर कार्रवाई करने में प्रशासन तुरंत सक्रिय हो जाता है।

उन्होंने कहा कि इस प्रकार बेणेश्वर धाम को आस्था के नाम पर भ्रष्टाचार और अवैध वसूली का अड्डा बना दिया गया है।

रोत ने आदिवासी युवाओं और क्षेत्र की अन्य समस्याओं को भी उठाया। उन्होंने कहा कि अनुसूचित क्षेत्र की विभिन्न भर्तियों में 30 से 40 प्रतिशत की जो बाध्यता रखी गई है उसे समाप्त किया जाना चाहिए और जनसंख्या के अनुपात में पद दिए जाने चाहिए। उन्होंने लंबे समय से लंबित बैकलॉग भर्तियों को भरने की मांग भी उठाई। इसके अलावा उन्होंने कहा कि आदिवासी क्षेत्र में लगभग डेढ़ से दो लाख परिवार वर्षों से बिलाना और चारागाह जमीन पर बसे हुए हैं, लेकिन उन्हें आज तक मालिकाना हक नहीं दिया गया है।

उन्होंने सरकार से मांग की कि विशेष अभियान चलाकर इन परिवारों को जमीन का अधिकार दिया जाए। उन्होंने ट्राइबल टूरिज्म कॉरिडोर योजना को भी फिर से लागू करने की मांग करते हुए कहा कि बांसवाड़ा, डूंगरपुर, उदयपुर और प्रतापगढ़ क्षेत्र में पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं और बेणेश्वर, मानगढ़, सीतामाता अभयारण्य, माही बांध और कडाना बांध जैसे स्थलों को जोड़कर ट्राइबल टूरिज्म कॉरिडोर बनाया जा सकता है, जिससे स्थानीय युवाओं को रोजगार के अवसर मिलेंगे।

रोत ने 1966 में राजस्थान और गुजरात सरकार के बीच हुए समझौते का हवाला देते हुए कहा कि माही और कडाना बांध के पानी का उपयोग कर बांसवाड़ा, डूंगरपुर, प्रतापगढ़, उदयपुर, खेरवाड़ा और सिरोही क्षेत्र में वृहद सिंचाई परियोजना शुरू की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि अब केंद्र, राजस्थान और गुजरात तीनों जगह एक ही दल की सरकार है, इसलिए इस योजना को लागू करने में कोई बाधा नहीं होनी चाहिए।

उन्होंने आदिवासी बहुल क्षेत्रों में शिक्षा व्यवस्था की खराब स्थिति पर भी चिंता जताई और कहा कि कई स्कूल जर्जर भवनों में चल रहे हैं तथा पिछले वर्षों में क्रमोन्नत हुए स्कूलों में अब तक पद स्वीकृत नहीं किए गए हैं। कॉलेजों में भी व्याख्याताओं की भारी कमी है, जिससे युवाओं का भविष्य प्रभावित हो रहा है। अंत में सांसद राजकुमार रोत ने कहा कि विपक्ष सरकार का दुश्मन नहीं होता बल्कि लोकतंत्र की जीवन रेखा होता है और उन्होंने मुख्यमंत्री से आग्रह किया कि वे जनजाति गौरव दिवस के मंच से आदिवासी समाज की समस्याओं को समझें और उनके समाधान के लिए ठोस घोषणाएं करें।

YouTube Join Now
Facebook Join Now
Social Samvad MagazineJoin Now
---Advertisement---

Social Samvad Creator