सोशल संवाद/राँची : झारखंड हाई कोर्ट के जस्टिस एसएन प्रसाद और जस्टिस गौतम कुमार चौधरी की अदालत ने एक वैवाहिक विवाद में महत्वपूर्ण निर्णय पारित किया है. अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि विवाह से पहले पति द्वारा महत्वपूर्ण तथ्य छिपाए जाते हैं और पत्नी की सहमति धोखे से ली जाती है, तो ऐसा विवाह कानून की नजर में टिकाऊ नहीं हो सकता.
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अदालत ने कहा कि लिव-इन रिलेशनशिप जैसी गंभीर जानकारी छिपाना धोखाधड़ी की श्रेणी में आता है और इससे विवाह निरस्त किया जाना पूरी तरह से न्यायसंगत है. अदालत ने गढ़वा फैमिली कोर्ट के 16 फरवरी 2017 के फैसले को बरकरार रखते हुए विवाह को निरस्त करने के आदेश को सही ठहराया. प्रियंका साही और सिद्धार्थ राव उर्फ राहुल का विवाह दो दिसंबर 2015 को गोरखपुर में हिंदू रीति-रिवाज से संपन्न हुआ था.
विवाह के बाद लिव-इन रिलेशनशिप का चला पता :
पत्नी का आरोप था कि विवाह के बाद उसे पता चला कि पति पहले से ही एक महिला के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहा था, जिसकी जानकारी जानबूझकर छिपाई गई थी. ससुराल पहुंचने के कुछ ही दिनों बाद उससे 15 लाख रुपये अतिरिक्त दहेज की मांग की गई. मांग पूरी न होने पर उसे मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया.
गढ़वा फैमिली कोर्ट ने पत्नी की याचिका स्वीकार करते हुए कहा था कि विवाह से पहले पति द्वारा अपने लिव-इन संबंध को छिपाना हिंदू विवाह अधिनियम के तहत धोखाधड़ी है. कोर्ट ने विवाह को शून्य घोषित करते हुए पति को पत्नी के पक्ष में 30 लाख रुपये स्थायी गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया था.
हाई कोर्ट ने पति के इस पक्ष को सिरे से खारिज कर दिया कि उसे पर्याप्त अवसर नहीं मिला. अदालत ने रिकार्ड का हवाला देते हुए कहा कि पति को कई बार समन और नोटिस भेजे गए, लेकिन उसने जानबूझकर अदालत में उपस्थित नही होकर कार्यवाही से दूरी बनाए रखी. ऐसे में फैमिली कोर्ट द्वारा एकतरफा सुनवाई पूरी तरह वैध थी. खंडपीठ ने टिप्पणी की कि दोनों पक्ष वर्ष 2016 से अलग रह रहे हैं और वैवाहिक संबंध पूरी तरह मृत अवस्था में पहुंच चुका है.
अदालत ने कहा कि ऐसे रिश्ते को जबरन जीवित रखना किसी भी पक्ष के हित में नहीं है. हाई कोर्ट ने माना कि व स्थायी गुजारा भत्ता तय करते समय पति की आय, सामाजिक स्थिति और पत्नी की शैक्षणिक योग्यता-सभी पहलुओं पर संतुलित दृष्टिकोण जरूरी है. रिकॉर्ड के अनुसार पति एक निजी कंपनी में वरिष्ठ पद पर कार्यरत है और मासिक आय लगभग 1.56 लाख रुपये है, जबकि पत्नी कानून स्नातक (एलएलबी) होने के बावजूद वर्तमान में बेरोजगार है.










