सोशल संवाद / नई दिल्ली : राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने गुरुवार को सदन में देश के विभिन्न हिस्सों में हो रहे जातिगत भेदभाव का मुद्दा प्रमुखता से उठाया। उन्होंने ओडिशा के एक आंगनवाड़ी केंद्र के बहिष्कार का उल्लेख करते हुए कहा कि एक दलित महिला द्वारा बच्चों का भोजन बनाए जाने के कारण इस तरह की प्रतिक्रिया सामने आई, जिसे उन्होंने संवैधानिक मूल्यों का हनन करार दिया।
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खरगे ने कहा कि 21वीं सदी में जब हम बड़े-बड़े सामाजिक सुधारों के दावे करते हैं, तब ओडिशा के एक आंगनवाड़ी केंद्र में पिछले तीन महीनों से दलित महिला सहायिका द्वारा बनाए गए भोजन को एक समुदाय विशेष के लोग अपने बच्चों को देने से मना कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि आंगनवाड़ी केंद्र बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास की बुनियाद हैं, लेकिन इस तरह के जातिगत भेदभाव से उनके विकास पर असर पड़ेगा।
कांग्रेस अध्यक्ष ने ऐसी घटनाओं को संविधान के अनुच्छेद 21(ए) का उल्लंघन बताया, जो बच्चों को शिक्षा का अधिकार सुनिश्चित करता है। साथ ही उन्होंने कहा कि ये घटनाएं अनुच्छेद 47 की भावना के भी विपरीत हैं, जिसके तहत राज्य पर पोषण स्तर बढ़ाने और जनस्वास्थ्य सुधारने की जिम्मेदारी है।
खरगे ने कहा कि इस तरह की घटनाएं कार्यस्थल पर होने वाले जातिगत भेदभाव का भी उदाहरण हैं। उन्होंने हाल के वर्षों में सामने आए अन्य मामलों का उल्लेख करते हुए कहा कि मध्य प्रदेश में एक आदिवासी मजदूर पर पेशाब करने की अमानवीय घटना हुई और गुजरात में एक 28 वर्षीय दलित सरकारी कर्मचारी ने जातिगत उत्पीड़न के कारण आत्महत्या कर ली। उन्होंने याद दिलाया कि चंडीगढ़ में एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी की मृत्यु के बाद पुलिस बल के भीतर संस्थागत जातिगत भेदभाव के गंभीर आरोप लगे थे।
उन्होंने कहा, ये घटनाएं दर्शाती हैं कि जातिगत भेदभाव केवल सामाजिक जीवन तक सीमित नहीं है, बल्कि कार्यस्थलों पर भी व्याप्त है। किसी भी कर्मचारी के साथ जाति के आधार पर भेदभाव करना संविधान का उल्लंघन और दंडनीय अपराध है। कांग्रेस अध्यक्ष ने मांग की कि ऐसे मामलों में समयबद्ध और सख्त कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। साथ ही जहां गंभीर उल्लंघन पाए जाएं, वहां संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही भी तय की जाए।










