सोशल संवाद / डेस्क : मध्य प्रदेश के गुना से एक ऐसी घटना सामने आई है, जिसने मुश्किल समय में आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के सामने आने वाली परेशानियों को उजागर किया है। आरोप है कि नवरात्रि के दौरान धार्मिक अनुष्ठान का हवाला देते हुए एक मकान मालिक ने किराए के घर में महिला का शव ले जाने से मना कर दिया। इसके बाद शोक में डूबे परिजनों को जिला अस्पताल के शवगृह के बाहर खुले परिसर में ही अंतिम संस्कार से पहले किए जाने वाले पारंपरिक रीति-रिवाज पूरे करने पड़े। रीति-रिवाज संपन्न होने के बाद महिला के शव को अंतिम संस्कार के लिए श्मशान घाट ले जाया गया।
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मृतका की पहचान 31 वर्षीय पूजा रजक के रूप में हुई है। वह लंबे समय से कैंसर से जूझ रही थीं और गुना जिला अस्पताल में इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। पूजा अपने पीछे दो बेटियां और एक बेटा छोड़ गई हैं। उनकी मौत के बाद परिवार पहले से ही गहरे सदमे में था। ऐसे में शव को घर ले जाने में कथित तौर पर आई बाधा ने परिजनों की मुश्किलें और बढ़ा दीं।
चार साल से किराए के मकान में रह रहा था परिवार
जानकारी के अनुसार, पूजा रजक मूल रूप से शिवपुरी जिले की रहने वाली थीं। परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर है और उनके पास अपना स्थायी घर नहीं है। पूजा पिछले कुछ वर्षों से गुना के घोसीपुरा इलाके में अपने माता-पिता के साथ किराए के मकान में रह रही थीं।
पूजा के पिता पहलवान रजक के सामने बेटी की मौत के बाद अंतिम संस्कार की व्यवस्था करने की चुनौती थी। परिवार को उम्मीद थी कि वे पारंपरिक रीति-रिवाज अपने किराए के घर पर पूरे कर सकेंगे, लेकिन आरोप है कि मकान मालिक ने नवरात्रि में धार्मिक अनुष्ठान होने का हवाला देकर शव को घर में लाने से मना कर दिया।
नवरात्रि के कारण शव घर लाने से इनकार करने का आरोप
पूजा के पिता के मुताबिक, परिवार जब अस्पताल से शव को घर ले जाने की तैयारी कर रहा था, तब मकान मालिक ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया। बताया गया कि मकान मालिक ने नवरात्रि के दौरान घर में धार्मिक अनुष्ठान होने की बात कही थी।
बेटी की मौत से दुखी परिवार ने विवाद बढ़ाने के बजाय मकान मालिक की बात का विरोध नहीं करने का फैसला किया। इसके बाद परिजनों के सामने यह सवाल खड़ा हो गया कि अंतिम संस्कार से पहले की जाने वाली पारंपरिक रस्में कहां पूरी की जाएं।
आखिरकार, अस्पताल के शवगृह के बाहर खुले परिसर में ही इन रस्मों को पूरा करना पड़ा। यह घटना परिवार के लिए बेहद कठिन समय में एक और परेशानी बन गई।
पति से खराब हो गए थे पूजा के संबंध
पूजा के पिता पहलवान रजक के अनुसार, बेटी की तबीयत बिगड़ने और घरेलू विवादों के बीच उनके पति राकेश लश्करी से संबंध खराब हो गए थे। राकेश इंदौर के रहने वाले हैं। बताया गया कि पूजा ससुराल छोड़कर पिछले कुछ वर्षों से अपने माता-पिता के साथ गुना में रह रही थीं।
लंबे समय से कैंसर से जूझ रही पूजा का जिला अस्पताल में इलाज चल रहा था। इलाज के दौरान उनकी हालत बिगड़ गई और उनकी मौत हो गई। उनके निधन के बाद परिवार को बच्चों की देखभाल और अंतिम संस्कार की व्यवस्था जैसी कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा।
समाजसेवियों ने आगे बढ़कर की मदद
परिवार की परेशानी की जानकारी मिलने के बाद समाजसेवी प्रमोद भार्गव और गौ-रक्षा कार्यकर्ता राम सिंह रजक मदद के लिए आगे आए। उनकी सहायता से अस्पताल के शवगृह के पास खुले परिसर में पूजा की मृत्यु के बाद किए जाने वाले पारंपरिक रीति-रिवाज संपन्न कराए गए।
इसके बाद शव को अंतिम संस्कार के लिए श्मशान घाट ले जाया गया। कठिन परिस्थिति में मिली इस सहायता से परिवार अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी कर सका।
दूसरी पत्नी के साथ गुना पहुंचे पति
पूजा की मौत की खबर मिलने के बाद उनके पति राकेश लश्करी भी इंदौर से गुना पहुंचे। बताया गया कि वह अपनी दूसरी पत्नी के साथ आए थे। उन्होंने अस्पताल परिसर में किए गए अंतिम रीति-रिवाजों में भी हिस्सा लिया।
इस घटना ने पूजा के परिवार के दुख को और गहरा कर दिया। एक ओर परिवार कैंसर से जूझ रही बेटी को खोने के सदमे में था, वहीं दूसरी ओर अंतिम संस्कार से पहले की रस्में पूरी करने के लिए भी उसे मुश्किलों का सामना करना पड़ा।
घटना ने खड़े किए मानवीय संवेदनाओं से जुड़े सवाल
गुना की यह घटना ऐसे समय सामने आई है, जब पूजा का परिवार आर्थिक तंगी और व्यक्तिगत दुख से गुजर रहा था। किसी परिजन की मृत्यु के बाद परिवार को अंतिम संस्कार की व्यवस्था करने के लिए समय, सहयोग और संवेदनशीलता की जरूरत होती है।
हालांकि, मकान मालिक की ओर से शव घर में लाने से मना किए जाने के पीछे की परिस्थितियों और उनके पक्ष की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध जानकारी में नहीं है। फिलहाल सामने आई जानकारी मृतका के परिजनों के आरोपों और घटना के विवरण पर आधारित है।
पूजा रजक के निधन के बाद उनके तीन बच्चों के भविष्य और परिवार की परिस्थितियों को लेकर भी चिंता बनी हुई है। यह घटना याद दिलाती है कि दुख की घड़ी में प्रभावित परिवार के प्रति संवेदनशीलता और मानवीय सहयोग कितना महत्वपूर्ण है।










